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मंगलवार, 21 जून 2016

एसगर - प्रेम बीहनि कथा

बासोपत्ती बस अड्डा । 'म'केँ दिल्ली जेए बला ट्रेन दरभंगासँ पकरैक छलै । बासोपत्तीसँ दरभंगाक धरिक यात्रा बससँ । बसक इन्तजारमे 'म' एकटा लगेज हाथमे नेने ठाड़ । ततबामे 'स' अफसीयाँत भागि कय आबि 'म' लग ठाड़ होति, टूकुर टूकुर ओकर मुँह तकैत । दुनू आँखिसँ नोर निकलि 'स'केँ गाल होति गरदनि धरि टघरि गेल ।
म, "तु एतेक कनै किएक छेँ?"
स म केर दुनू हाथ खीच, ओकर हाथपर अपन मुँह रखैत, "हम कहाँ कनि रहल छी ।"
ओकरा उदास आ कनैत देखि म दूटा बस छोरि देलकै ।
"हमरो ल' चलू, अहाँ बिनु हम एहिठाम नहि जी सकब । ओहीठाम हम सबकेँ कहबै जे हम अहाँक नोकरानी छी । अहाँक नेनाकेँ खेलाएब, घरमे पोछा लगाएब, बर्तन धोब ।"
ई कथन छल एकटा बिधबा माएक जेकर बेटा दिल्ली बाली संगे ब्याह कय दिल्लीए बसि गेल छल आ माए एसगर गाममे ।
@ जगदानन्द झा 'मनु'

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