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जय मिथिला जय मैथिली

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बुधवार, 19 मार्च 2014

गजल



जड़ि फसादक बड़्ड़ हमहूँ रोपने छी
छी अहाँ खुश तेँ अपन मुँह फेरने छी 

दोस्तकेँ दोस्ते ठकैए आइ सगरो
पीठमे भोँकैत छूरा देखने छी

भाइ माँ बाबूक आँखिक नोर बिसरि
सोन चानी की करब जे अरजने छी      

संग खूनक जे खलेलक सगर होली
एहनोकेँ नै किए हम बारने छी

छै चुनावक हाल एहन  देश भरिमे  
‘मनु’ अखाड़ा राजनीतिक पकरने छी  

(बहरे रमल, मात्रा क्रम – २१२२-२१२२-२१२२)
तेसर शेरमे मात्राक छूट लेल गेल अछि, बिसरि – बिसइर
जगदानन्द झा ‘मनु’  

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