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जय मिथिला जय मैथिली

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मंगलवार, 24 सितंबर 2013

कि एहि जगमे फेर नारीके सम्मान हेते ?

नहिं जानि  कहिया धरि एना अपमान हेते
कि एहि जगमे फेर नारीके सम्मान हेते
होइत अछि पूजा लक्ष्मी आ दुर्गाके जाहि ठाम
जुल्म होइत देखलौं हम , नारीपर ओहि ठाम
कि एहि
पर समाजके ध्यान जेते
कि एहि जगमे फेर नारीके सम्मान हेते
होय छथि माता दुःखी बेसी , बेटीके जनम लेलापर
दोष पिताके दै छथि सब ,किछु अनुचित भेलापर
वास्तवमे अपराधी के छथि एकर की पहचान हेते
कि एहि जगमे फेर नारीके सम्मान हेते
बेसी घटना ई देखेत छी पुतोहुक ऊपर अत्याचार
सासु ,ननदिके ई किरदानी , पति बेचारा भेल लाचार
तहियो पुरुषेके ऊपर सतवैके इल्जाम ऐते
कि एहि जग में फेरि नारी के सम्मान हेते
पुरूष बदनाम अछि मुदा नारी पर जुल्म करेत अछि नारी
हम (पुरुष) स्वीकार करेत छी जे एकर हमहँू दोषी छी भारी
लेकिन जे कियो ई काज करेत छथि ओ इन्सान हेते ?
कि एहि जगमे फेर नारीके सम्मान हेते
एहि लफड़ामे किएक   पड़ेत छी जुल्म पुरुष करेत वा नारी
सत्य गप्प ई अछि जे जुल्म कियो करथि सहय छथि नारी
नारी सन सहनषील जगमे नहिं कियो आन हेते
कि एहि जगमे फेर नारीके सम्मान हेते
एखन हम बेबस छी जे नहिं किछु क सकय छी
लेकिन अगिला पीढ़ीके नया सोचि द सकय छी
जे एहि दुनियामे बेटा बेटी एक समान हेते
कि एहि जगमे फेरि नारीके सम्मान हेते
इन्सान के इन्सानियत जतए धर्म छी
परोपकार जाहि जगह के कर्म छी
एहेन सुन्दर नव मिथिला के निर्माण हेते
जौं एहि जग में फेरि नारी के सम्मान हेते
नहिं जानी कहिया धरि एना अपमान हेते
कि एहि जग में फेरि नारी के सम्मान हेते
आशिक ’राज’

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