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शुक्रवार, 7 जून 2013

शिक्षाक दूत



अधवयसु सासु चुल्हिमे जाड़न लगबैत बाजल " यै कनियाँ, एना बनि-ठनि कऽ बौएनाइ ठीक नै अछि ।कने लाज-धाख कएल करू ।"
चौकीपर बैसल पुतौह नऽहपर अलता लगबैत उत्तर देलक " हम सजै छी तैसँ अहाँकेँ किए कोढ़ फटैए ?अपना लूरि नै छन्हि तँ दोसरकेँ दूसै छथि ।"
" यै एहिमे लूरि आ दूसै बला कोन बात छै ? अहाँ गामक पुतौह छी ।एना जँ करबै तँ लोक की कहत, दूसबै करत नै ? "
" अहाँ मोने हम पाँच हाथ घोघ तानि बाटपर चली जाहीसँ ठामे-ठाम ठोकर लागत आ हम खसि पड़ब ।अहाँ चाहिते छी जे हम मजाक बनि जाइ ।"
" हम से नै कहलौं ।कने दाबि-पीच कऽ रहू बस, और किछु नै ।"
" यै हम मास्टरनी छियै ।नेनाक आदर्श छीयै ।जँ हमहीं दबल रहब तँ नेना कोना उठि सकत ?नवका जमानाक शिक्षाक दूत छी, नवके जकाँ रहऽ पड़तै ।कतबो अहाँ जरि कऽ धुँआइत रहू, अहाँ जकाँ फाटल-चिटल पहिर चुल्हि नै ने फूकब ।"
सासु एक टक देखिते सोचि रहल छलीह जे एहन शिक्षाक दूतसँ समाजक उत्थान हेतै वा पतन ?

अमित मिश्र

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