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जय मिथिला जय मैथिली

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शुक्रवार, 7 जून 2013

ड्रामा



- रौ झगड़ूआ तोरा माँथपर सींघ जनमल हौ की ?
- से किए रौ घोघबा ?
- तोरा घरसँ हरदम हल्ले होइत रहै हौ ।लागैत हौ जे आब ककरो कपार फूटिये जेतौ ।
- नै बझलहीं ।हम-तूँ ठहरलौं मूरख, अनपढ़ ।तें लोक अपना आरकेँ छोट बुझै हौ ।
- लेकिन ऐसँ ई ड्रामकेँ कोन समबन्ध है ।
- अरे, आइ-काल्हि पढ़लो-लिखलकेँ घरमे एनाहिते नवाह जैसन झगड़ा होइ है ।तेँ हमहूँ झगड़ा बला फुसियाही ड्रामा करै छी जैसँ लोक हमरो शिकछित बुझै ।

अमित मिश्र

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