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शनिवार, 25 मई 2013

दया

एक बेर एकटा कविसँ किछु कविताक माँग भेलै ।कवि जी लिखबाक लेल बैसि गेलाह, मुद किछु फुराइते नै छलन्हि ।ओ दया, नि:स्वार्थ भरल भावपर लिखऽ चाहैत छलथि मुदा एहन भाव निपत्ता भऽ गेलै ।भरि दिन परेशान रहलाक बादो स्थिती जसकें तस ।थाकि-हारि झलफल बेर टहलऽ निकलि गेलनि ।बाटमे एकटा भीखमंगाकें होटल बला गरिया रहल छल, मुदा भीखमंगा टससँ मस नै भेल ।बेर-बेर पेट देखा रहल छल ।हारि कऽ होटल बला किछु बासी कचौड़ी दऽ देलकै ।भीखमंगा खुशी-खुशी चलि देलक ।चारिये डेग गेलापर एकटा दोसर भीखमंगाकें भूखे कुहरैत देखलक ।ओ अपन भीख बला कचौड़ी ओकरा दऽ अपन बाट धऽ लेलक ।ई देख कवि जीकें सबटा शब्द भावक संग फुराए लागलनि ।ओ खुश छलथि जे एखनो देशमे दया बचल अछि ।

अमित मिश्र

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