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सोमवार, 25 मार्च 2013

दर्दक खजाना

विहनि कथा- दर्दक खजाना


एकटा वृद्ध पथिक अति व्यस्त सड़कपर डगमगाइत डेगसँ चलैत जा रहल छल ।खन सड़कक कातमे तँ खन माँझमे चलैत, लागैत छल जे सुधि-बुधि हेरा गेल छै ।कतेको गाड़ी बाला ओहि पथिककें बचबैत चलि गेल मुदा एकटा मोटरसाइकिल बाला अपनाकें सम्हारि नै सकलै ।मोटरसाइकिलक अगिला चक्का वृद्ध पथिकक टाँगक मध्यमे सन्हिया गेलै ।एहि टक्करसँ ओ पथिक मुँहे भरे खसल ।मुँह हाथ आ ठेहुनमे बड जोरसँ चोट लागलै आ पथिक अचेत भऽ गेल ।फाटि गेल धोती खूनसँ ललिया गेलै ।मोटरसाइकिल बालाक संग अड़ोस-पड़ोसक लोक दौड़ल आ पथिककें उठा कऽ एकटा दोकानपर राखल बेन्चपर सुता देलकै ।किछु कालक बाद वृद्धकें होश एलै ।होश आबिते ओ जाए लागलै तँ एकटा नवयुवक कहलकै ,"बाबा, कने बिलमि जाउ ।डाँक्टर बाबू आबिते हेथिन्ह ।कमसँ कम पेन किलर तँ लऽ लिअ ।बड दर्द होइत हएत ।"

ई सुनिते पथिक घूरि गेल आ नवयुवक लऽग आबि शान्त स्वरमे बाजल, "बौआ, हमर अपन बेटा-पुतौह हमरा बोझ बूझि हमरे घरसँ निकालि कऽ जे दर्द देलक, ओहि दर्द लऽग ई दर्द पासङगो बराबर नै छै ।"

एहिसँ पहिने कि किओ किछु बाजितै ओ वृद्ध पथिक ईनाम भेटल दर्दक खजाना समेटने भीड़मे हेरा गेल ।

अमित मिश्र

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