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जय मिथिला जय मैथिली

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गुरुवार, 21 मार्च 2013

परिवर्तन

हमर (वा सभक) प्रवास ,जतऽ हम(सभ) रहैत छी
परिवर्तनपर परिवर्तन होइत देखैत छी
पहिराबा-ओढ़ाबासँ लऽ कऽ  खान-पान धरि
बाजब-भुकबसँ लऽ कऽ स्वागत-सम्मान धरि
कखनो पुबरिया तँ कखनो पछबरिया झोंका उठैत अछि
कखनो जुअनका तँ कखनो बुढ़बा ढेका कसि झूमैत अछि
बातक खोइँचा छोड़बैत गप्पीक हमजोली
मरनासन्न भऽ गेल अछि नुक्कर परहक टोली
जखने-तखने बेटा खिसिया उठैत अछि बापपर
पथराएल आँखि कानैत अछि बाप बनबाक पापपर
क्षणे-क्षणे एकमहला घर और नम्हर भेल जाइत अछि
मुदा उपरसँ देखैत छी तँ लोके छोट भेल जाइत अछि
परिवर्तन तँ एहि संसारक अकाट्य नियम अछि
मुदा वर्जित अति तँ सदिखन प्राण हरैत यम अछि
एहि परिवर्तनशील समाजमे जुनि होउ एते परिवर्तित
जे समयसँ पहिने भऽ जाएब काल ग्रसित

अमित मिश्र

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