नील पट्टीकेँ क्लीक कए कs ब्लॉगक सदस्य बनल जाउ

जय मिथिला जय मैथिली

रचना मात्र मैथिलीमे आ स्वम् लिखित होबाक चाही। जँ कोनो अन्य रचनाकारक मैथिली रचना प्रकाशित करए चाहै छी तँ मूल रचनाकारक नाम आ अनुमति अवश्य होबाक चाही। बादमे कोनो तरहक बिबाद लेल ई ब्लॉग जिमेदार नहि होएत। बस अहाँकें jagdanandjha@gmail.com पर एकटा मेल करैकेँ अछि। हम अहाँकेँ अहाँक ब्लॉग पर लेखककेँ रूपमे आमन्त्रित कए देब। अहाँ मेल स्वीकार कएला बाद अपन, कविता, गीत, गजल, कथा, विहनि कथा, आलेख, निबन्ध, समाचार, यात्रासंस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्ध रचना, चित्रकारी आदि अपन हाथे स्वं प्रकाशित करए लागब।

सोमवार, 7 जनवरी 2013

समय चक्र



किशुनक विशाल ड्राइंग रूम । तीन बीएचके फ्लेटमे आलीशान 250 वर्गफूटक हॉल नूमा ड्राइंग रूम ओहिमे 48 इंचक सोनीक एलसीडी  टीवी लागल । डीस टीवी, म्यूजिक प्लेयर, फर्सपर जड़ीदार लाल रंगक विदेशी  क़ालीन । दवाल सभपर मनभावन मधुबनी पेंटिंग घरक सोभामे चारि चान लगाबैत । मोट- मोट गद्दाक बनल मखमली सोफा सेट, ओहिपर किशुनक मामा-मामी ओकर वेसबरीसँ बाट जोहैत, जे कखन ओ आएत आ ओकरासँ दूटा गप्प कए अपन समस्याक समाधन करी । हुनक दुनू प्राणीक  दू घंटाक प्रतीक्षा बाद किशुन, बोगला सन उज्जर चमचमाइत  बरका कारसँ आएल । घरक डोरवेल बजेलक घर खुजल । भीतर प्रवेश कएलक । भीतर पएर धरैत देरी ओकर नजैर अपन मामा- मामीपर परलैक । तुरन्त आगू बढ़ि हुनकर दुनू पएर छुबि आशीर्वाद लेलक । हाल समाचार पुछैत अपनो एकटा सोफापर बैसैत - "कएखन एलीऐ" ।
मामी - "इहे करीब दू घंटा भएले" ।
किशुन अप्पन कनियाँकेँ आवाज़ दैत - "यै, सुनैछीयै ! किछु चाह पानि नास्ता देलियैन्हेकी" ।
मामा - "ओसभ भए गेलै, बस अहाँसँ किछु जरूरी गप्प करैक  छल" ।
किशुन - "हाँ हाँ कहु ने, हमर सोभाग्य जे अपनेक किछु सेबाक मोंका भेटत" ।
मामा कनखीसँ इसारा कए मामीक दिस देखलाह, आ ओकर बाद मामी - " बौआ ! अहाँ तँ सभटा बुझिते छियै जे मामाक नोकरीक आइ- काल्हि की दशा छनि । कएखनो छनि तँ कएखनो नहि । रहलो उत्तर ई सात- आठ हजार रुपैया महिनाक नोकरीसँ की है छैक ...... (कनी काल चूप, आगू  सोचैत ) अहाँकेँ तँ बुझले अछि, बरुण आइ आइ टीक प्रवेश परीक्षा पास कए लेलक । आब ओकर एडमिशनकेँ आ किताब आदी लेल दू लाख रुपैया चाहीऐ । हिनका अपना लग तँ एको रुपैया नहि छनि, आ अहाँ तँ बुझिते छियै दियाद बाद कएकराकेँ दै छैक । बहुत आशा लए कए अहाँ लग एलहुँहेँ , अहाँ किछु रुपैयाक व्यवस्था कए देबै तँ छौड़ाक जिनगी बनि जेतै" ।  
सभ चूप्प । पिन ड्राप सैलेन्श । किशुन अपन आँखिसँ चश्मा निकालि दुनू आँखिक कोन कए सभसँ नूका कए पोछ्लक । कियो ओकर आँखिक कोनसँ खसैत नोरकेँ नहि देखने हेतै मुदा ओकर दुनू आँखिक कोनसँ नोरक दू दू टा मोती सरैक कए ओकर रुमालमे हड़ा गेलै । पुनः अपन चश्मा पहिरलक आ अपन आँखिक नोरक पाँछाँ करैत बीस बर्ख पाछू चलि गेल ।
जखन किशुनक माए बाबू आ मामा मामी एके झोपड़पट्टीक एके गलीमे रहैत छला । एक दिन ! महिनाक अन्त तक ओकर बाबूक हाथ खाली भए जेबाक कारण घरमे अन्नक अभाबे ओ अपन माएकेँ कहलापर एहि मामीसँ जा कहने रहनि दू सेर चौर देबएक लेल । मामी चौर तँ देलखिन मुदा ओहिसँ पहिने ठोर चिब्बैत कहने रहथिन - " की बाप पाइ नहि दए क गेलाह, एहिठाम कोन बखाड़ी लागल छैक " ।
ओ गप्प किशन आइ तक नहि बिसरल । आ ओकर आँखिक नोरक कारण इहे गप्प छल । ओहि  गप्पक कारणे आइ ओ झोपरपट्टीसँ निकैल एकटा नव दुनियाँमे पएर रखलक । पुनः अपनाकेँ वर्तमानमे आनैत किशन चट्टे अपन कोटक जेबीसँ चैक बुक निकालि, ओहिपर दू लाख रुपैया भरि मामाक दिस बढ़ेलक ।
मामा चैक लैत - "बौआ अहाँक ई उपकार हम कहियो नहि बिसरब, एखन तँ नहि चारि वर्खक बाद वरुणक नोकरी लगलापर सभसँ पहिने अहींक पाइ वापस करत" ।
किशन - "की मामा अहुँ लज्जित करै छी ई सभ कएकर छैक, की वरुण हमर भाइ नहि अछि । ई हमरा दिससँ एकटा छोट भेंट अछि । एकर चिंता अहाँ नहि करब ।
*****
जगदानन्द झा 'मनु'  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें