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जय मिथिला जय मैथिली

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शनिवार, 3 नवंबर 2012

गजल

अखनो अहीं के आस में जीब रहल छी हम    
विरह के जहर आब पीब रहल छी हम

बिसरला के पछातियो मोन पड़ेति होयत
मोन पारु कि कतेक करीब रहल छी हम

सबकिछु होयतो किछुूओ नहिं अछि हमरा
अहाँ के बाद एतेक गरीब रहल छी हम

कतहु रही खुष रही और हमरा की चाही
साँस चलेति अछि और जीब रहल छी हम

कियो नहिं पतियेते और अहुँ नहिं मानब
कोना एक दोसर के नसीब रहल छी हम

सरल वार्णिक बहर
वर्ण - 17
आशिक ’राज’

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