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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

“जलके तल पर लिखिल नाम “


जलके तल पर लिखिल नाम एकगो विहनि कथा अछि अहाँ  सभ  पढु  बहुत नीक  लागत, कथा एहि प्रकार अछि ----

रतन आ मालती दुनू गोटेक गाम एक दोसरा स सटल छलैक , दुनू गाम मे नोत-हकार आ जवारी चलैत छलैन, वैवाहिक संबंध सेहो होईत  छलैक, बीच मे एकटा पोखरि छलैक जाहिपर एकटा शिव-मंदिर सेहो छल।
एक बेर रतन अपन संगीक संग मलतीक गाछीमे आवि बलजोरी आम बिछि लेने छल ताहिपर मालती सबके गारि पढलक, किन्तु तकर ओहि हेजपर कोनो असरि नहि परलैक, ओ सभ दोलिपर खसल आम बिछिते गेलैक, मालतिक गारिक चखी बंद नहि होएत देखि रतन के किछु नहि  फुरलैक त ओ ओकरा मुह दुसी आगा बढ़ी गेल, संयोगस मालती आ रतन एकही स्कूलक एके बर्गमे नामांकित करोलेक, दुनु गोटे मैट्रिक पास केलक, मालती पारिवारिक आथिक संकट आ नकली सामाजिक मर्यादक कारने आगा नहि पढ़ी सकल आ रतन मेडिकलमें चल गेल,
एक दिन रतन स्नानक बाद महादेव पर माथा टेकने पाठ क अ रहल छल-करचरण कूर्तु वा कजयं  कर्मजं वा............. श्रवन नयन ........../ मंदिर में क्यों नहि छलैक , ताहि काल मालती सेहो पूजा करय अयलि, ओ अच्छत आ वेलपत्र महादेव पर छिटेत लोटो भरि जल ढारी देलक, रतनक माथ नहा गेलैक, रतन के तामस भ गेलैक -गय; एना आन्हरी जका जल किएक ढारलाही? साँसे देह भिज गेल, पर्तुत्तर में मालती बजली-देह त नहिये गैल गेलोअ, आ ओना बताह जका महादेव पर माथ किएक टेकने छले ?. लोको के पूजा नहि कर अ देबही?, माथपर परि गेलो त हम की करियो ? . आ ओ मंदिर स बहरा गेली/  आई स्नान करेत काल मालती रतनके देखि सोचय लागलि-जकरा ओ यैठ ओठीस मारने छलैक, कालराहा कहने छलैक से कतेक मूल्यवान भअ गेलैक, रतन धनिक बापक बेटा अछी, बिवाहक लेल ओकर बाप बहुत रास टकाक माग करेत छएई,

मालतीक हिर्दय आकंछाक उधियानस भरल छलैक, ओ ऊपर आबि काय एकटा ईट उठा लेलक आ घाटपर आबि खूब जुमा क़अ जोस्स पानि में फेकि देलक, ईट चभाक दअ पानिमें खसलैक, जोरस आवाज भेलैक, थोरेक पानि उरलैक आ पोखरीक तरंग चारू कात पसरिक गेलैक,


रतन स्वर सुनी चोक़ल, ओ घाटपर मालतिके नि निर्मिमेसा तकैत देखलक, ओकरा मालती कोनो महाकवि महाकाव्यक नायिका जाका बूझि परलैक, कोनो चित्रकारक उरेहल नायिका जाका बूझि परलैक कोई/ शिलपिक मूर्तिशिल्प जका बूझि परलैक, रतन मालतिके किछु देखैत रहल मालतिक चेहरापर छनिक उल्लास आ तृप्तक रंग अयलैक, आ बिला गेलैक, औ आखिमे सुन्यता उतरि अयलैक, ओ माथ झुका लेलक आ पानिमे पैसि गेलि आ भरि डार पानिमे पानिक सतःके हाथक तरहत्थिस निपय लागलि - र त न, र त न, र त न, फेर ओहि लिखलाहा स्थानक तरंगक बिचमे रतन दिस ताकि ओ जल्दी-जल्दी दू -तिन डूब देलक , रतनक नामसे जेना ओकर सोंसे देह नहा गेलैक. रतन चुप चाप देखैत रही गेला, मालतीके और ओ नहाक चली गेल.

सुभाष झा (मधुबनी)

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