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जय मिथिला जय मैथिली

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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

गजल


सभकियो दुनियाँमे किएक आँखि चोराबै छैक  
माँगि नहि लिए कियो तेँ सभकिछु नुकाबै छैक  

गरीबी भेलैक बहुते केहन ई व्यबस्था छैक 
गरीबी नहि सरकार गरीबेकेँ मेटाबै छैक 

साउस भेली सरदार गलती नहि हुनकर 
जतए ततए किएक पुतोहुकेँ जड़ाबै छैक 

जतेक दर्द बेटामे  बेटीयोमे ओतबे सभकेँ 
बेटा बिकाइ किएक बेटीकेँ सभ हटाबै छैक 

दुनियाँक रीत  एहन 'मनु'केँ नै सोहाइ छैक 
रहए जे खोपड़ीमे सभक घर बनाबै  छैक  

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)     

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