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जय मिथिला जय मैथिली

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शनिवार, 15 सितंबर 2012

हम एगो गाछ छी


अपन वंशक एकमात्र गाछ
एहि नम्हर परतीमे धीपैत ठूंठ पेड़
इतिहासक पन्नामे डूबल
पल-पल जीबाक लेल तरसैत
दर्दक सागरमे ठाढ़
हम एगो गाछ छी

कहियो साँझ-भोर हमर ठाढ़िपर

नवाह जकाँ होइ छल अनघोल
शीतल छाहरिमे एतै बैसकऽ दू जुआन मन
रिश्ता जोड़ैत ,बाजै छल नव-नव बोल
चिख कऽ बटोही मीठगर फल
दैत छल आशीषक टोल
आइ वैह बोल सुनै लेल
क्षण-क्षण तरसैत
हम एगो गाछ छी

अंधविश्वासक चक्करमे
हलाल भेलोँ जेना खस्सी
काँपैत रहलौँ भविष्यक भयसँ
जेना नवयौवनाक अधरक हँसी
मनुखक नीज कोटी स्वार्थसँ
बली-बेदी पर चढ़ैत
हम एगो गाछ छी

माँटि कतऽ छै आब शहरमे
कंक्रीटक मोट परत छै सतहपर
पानियोँ तँ गुलैरक फूल भेलै
हमरा लेल नै टंकीमे छतपर
हम जनमि नै सकै छी दुर्भाग्यसँ
कोखमे बेटी जकाँ मरैत
हम एगो गाछ छी

हे मुर्ख मानव! आबो तँ जाग
हमरा मारि कऽ की लेबेँ
बेटी गेलौ तँ वंश गेलौ
हम मरबौ तँ तूहूँ मरि जेबेँ
एहि महामुर्खक दुनियाँकेँ
आब छोड़ैत
हम एगो गाछ छी ।

{हमर हिन्दी कवितासँ मैथिली अनुवाद}

अमित मिश्र

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