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जय मिथिला जय मैथिली

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शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

भगवान आहाँ हमर प्रणकेँ लाज राखि लेब





किछु दिन भेल,
दिल्लीसँ पटना लौटैत रही,
गुंजन श्री 
मोनहीं मोन एकटा बात सोचैत रही,
ताबेत एकता अर्धनग्न बच्चा सोझामे आयल,
आ कोरामे अपनोसँ छोटके लेने,
चट्ट दसोझामे औंघरायल,
हम सोचिते रही  जे आब की करी  ,
बच्चा बाजल,-
सैहेब अहाँ की सोचि रहल छी  ?
हम तआब अपनों सोचनाय छोड़ि देने छी ,
जौ मोन हुए त दान करू,
हमरा हालैतीपर सोच कनै हमर अपमान करू,
बात सुनि ओकर, 
अपन जेबीमे हाथ देलहुं,
आ ओकर तरहत्थीपर किछु पाइ गाइन देलहुं,
डेरा पहूँची कसोचलहूँ की हम ई नीक केलहुं,
या एकटा निरीह नेन्नाकेँ भिखमंगीकेँ रास्ता पर आगू बढ़ा देलहुं,
प्रण केलहूँ अछि जे आब ककरो भीख नहि  देब,
भगवान आहाँ हमर प्रणकेँ लाज राखि लेब,
जा हम त अपने भीख माँगि रहल छी भगवान सँ,
जो रे भिखमंगा,....छिह.......

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