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जय मिथिला जय मैथिली

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शनिवार, 25 अगस्त 2012

गजल


गीत आ गजलमे अहाँ ओझराति किएक छी 
हुए मैथिलीक विकास अंसोहाति किएक छी 

परती पराँत जतए कोनो उपजा नहि है 
तीन  फसल ओतएसँ फरमाति किएक छी 

जतए सह सह बिच्छू आ साँप भरल होई
ओतए बिना नोतने अहाँ देखाति किएक छी 

अप्पन चटीएसँ नै   फुरसैत भेटे अहाँकेँ
सिलौटपर माथ फोरि कs औनाति किएक छी  

आँखि पथने बरखसँ अहीँक रस्ता तकै छी 
प्राणसँ बेसी 'मनु' मनकेँ सोहाति किएक छी     

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १७)

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