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जय मिथिला जय मैथिली

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मंगलवार, 19 जून 2012

गजल

अपन आंखिक पुतली अहाँ क बना ली जों अहाँ कहि त'
हम त अपन करेजक खोह में नुका ली जों अहाँ कहि त'

सौंस जग केर नजेर सौं राखब ओझल क' अहाँ कहू
अपन आंखिक काजरक रेख सजा ली जों अहाँ कहि त

लाख करी कोशिस नै बुझे किओ ठोर पर अहाँक नाम
हम अपन वाणी क' मीठ शब्द बना ली जों अहाँ कहि त'

सगर नग्र भेल छी बदनाम अहिं क' प्रेम में साजन
सौंस नगर सौं हम प्रेम ग्रन्थ पढ़ा ली जों अहाँ कहि त'

मोन छल उडीतौ पैंख पसारि दुनु मिली नील गगन
बनि पखेरू ''रूबी''अहूँ क' संग उड़ा ली जों अहाँ कहि त'

वर्ण -२१
रूबी झा

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