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सोमवार, 25 जून 2012

कविता - तस्वीर बदलबा के अछि


सरल भाव संचेतन मोन में,
फुटि रहल अछि  चिनगारी!
आंखि सुन्न भय देखि रहल अछि ,
मरजादा आर हया केर लाचारी!
मोन में दृढ संकल्पित भ कय,
तस्वीर बदलबा के  अछि !
नहि चाही आब ओ समाज,
जाहि में नारी कानति होईति!
जग में सुन्नर रूप दया केर,
स्नेहपूर्ण आ दुखियारी !
ममता केर दरिया सन बहि क,
किया सुखायल होइथि नारी!
निश्चल भ मानी एहि अटल सत्य के,
नारि सकल जगतक सृजनकारी!
तिरस्कृत,अपमानित आ प्रतारित भ,
लेती रूप संहारकारी!
बदलल दुनिया आ सोच बदलि गेल,
पुरुशहूँ टा जरुर बदलतय!
नारियो सबतरि सम्मानित होइथी,
हुन्कहूँ दशा सुधरते!
पर ध्यान रहै माता आ बहिन,
बदलै नहि नारि सुलभ लज्जा आ चिर-मर्यादित नारी!
बदलल जुग केर एहि परिपाटी में,ई जुग पुरान सच रहै जारी!
---राजीव रंजन मिश्र

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