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जय मिथिला जय मैथिली

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गुरुवार, 24 मई 2012

नाकाम

हर दम दुःख अपन भुलाबै चाहलौं

एकरा आन सँ हमेशा बचाबै चाहलौं

वोहे किस्सा हमरा दिस बढ़ि रहल अछि अखनिधरि

वोहे आगि सीना में धधकि रहल अछि अखनिधरि

वोहे व्यर्थ के चुभन अछि छाती में अखनिधरि

वोहे बेकार इच्छा हमर बनल अछि अखनिधरि

दुःख बढैत गेल मुदा इलाज नहि भए सकल

हमर बेचैन हालात के आराम कहाँ भेटल

मोन दुनिया के हर दर्द के अपना त' लेलक

व्याकुल आत्मा के उन्मादक ढंग नहि भेटल

हमर कल्पना के बिखरल क्रम अछि वहै

हमर बुझैत अहसास के स्तिथि अछि वहै

वोहे बेजान इरादा आ वोहे बेरंग सवाल

वोहे बेकार खींचातानि आर बेचैन ख्याल

आह ! ई रोजक कश्मकश्क के अंजाम

हमहुं नाकाम, हमर  कोशिशो नाकाम !!!!!!!!!!!!!

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