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जय मिथिला जय मैथिली

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मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

गजल

 ईहे हमर प्रेमक सजा राखने छी त' कोनो बात नै
आई हमरा ज्यो ई व्यथा अहाँ देने छी त कोनो बात नै

ईहो कम छैक अहाँ देखैत छी ओत कात सँ अखनो
जँ आई हमरा मजधारे डूबेने छी त कोनो बात नै

छलौ हम राखने करेजाक अंतिम तह में नुका क
अहाँ ओ अन्तःपूर अपने छोरने छी त कोनो बात नै

अहीं निर्मल शीशा एहन हमर आत्मा बनोने छलौं
ओ शीशा जँ अहाँ अपने सँ तोरने छी त कोनो बात नै

छैक ककर मजाल कहत रुबी क' अपन दीवानी
मुदा जँ ई गप अहाँ कतौ बजने छी त कोनो बात नै

वर्ण- २०
रुबी झा

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