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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

खुशी



कलुआही, बुध दिनक हटिया, चारुकात भीर-भार, बेपारी आ खरीदारक हल्ला-गुल्ला, कियो बेचैमे व्यस्त तँ  कियो कीनैमे मस्त | दीनानाथजी अपन कनियाँ संगे हटियामे प्रबेश कएलथि | हाटक मुँहेपर एकटा सात-आठ बर्खक बच्चिया हाथमे धनी-पात लेने हल्ला करैत,  "एक रुपैयाकेँ  दू मुठ्ठी, एक रुपैयाकेँ  दू मुठ्ठी"
मुदा सभ  कियोक ओकर बातकेँ  अनसुना करैत हाटक भीरमे बिलीन भेल जाए | दीनानाथजी सेहो ओकर बातकेँ  सुनैत हाटक भीरमे मिल गेलाह |
दू घंटा बाद, जखन दीनानाथजी अपन खरीदारी  कएलाक बाद हाटक मुँहपर वापस एला तँ  देखला, धनी-पात बाली बच्चिया पूर्ववत असगरे हल्ला करैत | दू मिनट मोन भए  ओहिठाम ठार भेला | हुनक कनियाँ, "चलून' धनी-पात तँ  अपने बारीमे बड्ड अछि "
दीनानाथजी, "कनी रुकू | "  कहैत आगू  धनी-पात बाली बच्चियासँ,  "कोना दै छिही बुच्ची"
बुच्ची, " बाबू एक रुपैयाकेँ दू मुठ्ठी, मुदा एखन तक किच्छो नै बिकेल, अहाँ एक रुपैयाकेँ  तीन मुठ्ठी लए  लिअ | "
दीनानाथजी,  "सभटा कतेक छौ |"
बुच्ची गनैत, "एक,दू,- - सात, आठ - - - बारह,तेरह - - - उनैस, बीस, बीस मुठ्ठी बाबूजी |"
दीनानाथजी,  "सभटा दय दे |"
कनियाँ,  "हे-हे की करब ?"
दीनानाथजी कनियाँकेँ  इशारासँ चुप करैत, अपन कुर्ताक जेबीसँ एकटा दस रुपैयाक नोट निकालि कए  बुच्चीकेँ  देला बाद धनी-पात लैत, ओहिठामसँ बिदा भए गेला |
घर अबैत, दलानपर बान्हल जोड़  भरि बरद, हुनक आहटेसँ अपन-अपन कान उठा कए मानु सलामी देबअ लागल | ओहो आगू आबि कs सिनेहसँ दुनूकेँ  माथ होँसथति, अपन झोरीसँ धनी-पात निकालि नाइदमे दए  देलखिन्ह | ई देखि कनियाँ, "ई की कएलहुँ दस रुपैयाक धनी-पात बरदकेँ  दए  देलियै, एतेककेँ  घास लेतहुँ तँ  बरद भरि  दिन खैतए | "
दीनानाथजी,  "कोनो बात नहि दस रुपैया तँ  सभकेँ  देखाइ  छैक मुदा ओइ  धनी-पात बाली बच्चियाकेँ मुँहपर जे असंतोस,निरासा आ दुखक भाव रहैक ओ केकरो नै देखाइ  | आ देखलीयै बिकेला बादक खुशी, ओहि  खुशीक मोल कतौ दस रुपैयासँ बेसी हेतैक |"
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जगदानन्द  झा  'मनु'



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