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जय मिथिला जय मैथिली

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रविवार, 1 अप्रैल 2012

फूल डे

विहनि कथा
चारि बजे भोरे करीया उठि गेल । स्नान-ध्यान क' कोयला सिलौट पर पिसलक , लोढ़ी पर अक्षत-फूल चढ़ा , कोयला कए गर्दा कए चानन बना माँथ , पिठ , बाँहि ,छाती , गर्दन पर लगेलक । करिका सर्ट-पेण्ट पहीर गामक मंदिर दिश चलि देलक । कारी चाम पर कारी तिलक आ कारी वस्त्र ,डेराउन रूप लागैए , आधा पाकल केश ओहि रूप कए और भयानक बनेने छलैए । छ' बजे भोरे मंदिर पहुँचल तेँ कोनो भीड़-भाड़ नहि छलै । करीया तीन -चारि बेर चारू कात हियासलक मुदा केउ नजर नहि एलै ।थाकि-हारि क' पाया मे पिठ सटा बैस गेल । सुरज चढ़ति गेलाह , 12 बाजि गेल । तखने मंदिरक कोना मे करीया कए अपन दोस्त देखाइ देलकै , ओकरा लग जा क' बाजलै , "बेचना . जेना-जेना तूँ कहने छलैँ तेना-तेना पूजा क' हम भोरे सँ एत' छी , आब रहल नहि जाइ यै , जल्दी ओकरा देखा जेकरा संग जीवन काटब ।"
बेचना आ और संगी सब ठहक्का मारैत बाजल ,"बड़का मूर्ख छेँ तूँ रौ , तोरा सन 40 वर्षक बूढ़बा सँ के बियाह करतौ? हम सब तोरा उल्लू बनेलियौ ,जानै नहि छहीँ आइ फूल डे छै ।"
सब ठहक्का मारि करीया कए खिसियाब' लागल आ करीया सोच' लागल जे इ नाम त' कहियो नहि सुनलौँ आखीर कोन लड़की वा कोन जानवर कए नाम छै फूल डे?
अमित मिश्र

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