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जय मिथिला जय मैथिली

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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

नाटक: "जागु"
दृश्य: चारिम
समय: दिन

(खेत में नारायण खेत तमैत)
(अकबर कें प्रवेश)

अकबर: प्रणाम, नारायण भाई!

नारायण: खूब निकें रहू !

अकबर: बुझि परैया खेतक खूब सेवा करैत छी !

नारायण: की सेवा करबै ?  माएक दूधक कर्ज कियो चुका सकैत अछि ? तहन  जतेक पार लगैया करैत छी !

अकबर: ...ठीक कहलौं ! माए आ खेत में कनेकों भेद नै । लोक माएक दूध पीब आ खेतक अन्न खाए पैघ होइत अछि , मुदा, देखबा में अबैत अछि जेँ मनुष्य पैघ भेला' बाद  माए आ खेत दुनु  कें बिसैर  भदेस  में जा ' बैस जाइत अछि  ।

नारायण: हम की कही ? ...कहबा लेल हमरा माए कें पांचटा  बेटा , मुदा, केकरो सँ कोनो सुख नै ! चारिटा भदेस रहैत अछि आ हम एकटा गाम पर रहैत छी , जतेक पार लगैत अछि सेवा करबाक प्रयत्न करैत छी ! ओकरा चारू कें त' पांच-छ: वर्ष गाम एलाह  भ' गेलहि ....

अकबर:..पांच-छ: वर्ष !! धन्य छथि महाप्रभु सभ ! की हुनका लोकन कें अपन जननी -जन्मभूमि कें याद नै अबैत छन्हि ??

नारायण:.. फोन केने छलाह --छुट्टी नै भेटहिया ! माए हेतु खर्चा हम सभ भाई मिल क' भेज देब ।

अकबर: तौबा!तौबा!! ई पापी पेट जे नै कराबाए  ! एक बिताक उदर भड़बाक  हेतु जननी-जन्मभूमिक परित्याग ! -भाई , की मिथिलांचल एतेक निर्धन थिक?  की माएक छातीक ढूध सुइख गेलहि  --जे एकर धिया-पुता कें दोसरक छातीक दूध पीबअ लेल विवश होबअ पइड़ रहल छै  ?

नारायण: नै भाई, नै ! हम एहि गप के नै मानैत छी , जे माए मैथिलिक छातीक दूध सुखा गेलाए ! ओकर दूध त' बहि क' क्षति भ' रहल छै ! कारण, धिया -पुता सभ 'सभ्य आ संस्कारी ' दूध पिबहे नै चाहैत अछि ! ओकरा त' भदेसी डिब्बा बंद दूध पिबाक  हीस्सक लागि गेल छै ।

अकबर: ठीक कहलौं ! धान कटेबाक अछि , एकटा ज'न नै भेट रहल अछि । सब दोसर जगह जा' गाहिर -बात सुनि गधहा जेना खटैत अछि, मुदा, अपन गाम आ अपन खेत में काज करबा' में लाज होइत छै ! भदेस में रिक्शा-ठेला सब चलाएत , मुदा, अपना गाम में मजदूरी नै करत ! आ भदेस में अनेरो अपन जननी-जन्मभूमि के अपनों आ दोसरो सँ गरियायत..

नारायण: अरे, हम त' कहैत छि--किछु दिन जँ जी-जान सँ एहि धरती पर मेहनत काएल जाए त' ई धरती फेर हँसत-लहलहाएत । कोनो धिया-पुता कें माएक ममताक आँचर सँ दूर नै रहए  पड़तै ।

अकबर: मुदा, ई होएत कोना ? कोना सुतल आत्मा कें जगाओल जाए?

नारायण:एहि हेतु सभ सँ पहिने हमरा लोकन कें जाइत-पाइत सँ ऊपर उठि एक होबअ पड़त ! हमरा सभ कें बुझअ पड़त  जे हम सभ मिथिलावाशी छी  अओर हमर मात्र एक भाषा थिक 'मिथिली' , हमर मात्र एक उद्देश्य थिक सम्पूर्ण मिथिलाक विकाश ।

अकबर: (खेत सँ माइट उठबैत ) हाँ  भाई, हाँ ! हम सभ एक छी --"मिथिलावाशी" । एहि माइट में ओ सुगंध अछि जकर महक अपना धिया-पुता कें जरुर खिंच लाएत ।(कविता पाठ)
        "हम छी मैथिल मिथिलावाशी, मैथिली मधुरभाषी ।
      मातृभूमि अछि मिथिला हमर, हम मिथिला केर संतान ।
     सीता सन बहिन हमर , पिता जनक समान ।
    नै कोनो अछि भेद-भाव , नै जाइत-पाइत कें अछि निशान ।
आउ एक स्वर में एक संग , हम मिथिला कें करी गुण-गान ---जय मिथिला , जय मैथिली ।
  पर्दा खसैत अछि
तेसर दृश्यक समाप्ति 
 
          

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