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जय मिथिला जय मैथिली

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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

गजल


करेज में बसा कs कनी हमरो तs पिआर करु
ओहि काबिल तs छी अहाँ हमरा सँ दुलार करु

छोरि एलहुँ जग में अहाँ केँ खातिर सब किछ
आब अहाँ केँ ऊपर अछि कि अहाँ स्वीकार करु

हमरो तs मोनमे अछि कि कियो अपना मानए
दुनिआ में कियो तs होई जेकरा सँ पिआर करु

हम सिखलौं दुनिआ में पिआर केनाई सब सँ
नहि सिखलौं पिआर में हम कोना बेपार करु

नहि कियो बुझलक, नहि केकरो हम बुझलौं
एहि दुनिआ में पिआर केकरा सँ उधार करु

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८)
***जगदानन्द झा 'मनु'

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