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जय मिथिला जय मैथिली

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शुक्रवार, 2 मार्च 2012

Koyali Ke Kuhu-Kuhu!

प्रकृतिके सुन्दर लीला - बसन्त ऋतुके आगमन आ बाग-बगिया सँ - बारी-झारी सँ - कलम-गाछीसँ - खेत-खरिहानसँ - चर-चाँचरसँ कोयलीके कू-कू कानमें पड़ैछ, आवाज एहेन सुरम्य - एहेन मीठ जे स्वतः मनमें मिश्री घोरैछ। जेम्हर देखू तेम्हर मादकता आ सरसता छलैक रहल अछि एहि सुन्दर सुहावन मौसममें। मिथिला के कण-कण मगन भेल रहैछ। मगन होयबाक बहुत रास कारण छैक। एहि मासके मधुमास सेहो कहल जाइछ - आममें मज्जड़ लागि गेल छैक आ रस टपैक रहल छैक, मौह सन कठोर काठके गाछ सेहो एहि मास फुलायल छैक आ फूलसँ रस एक सुन्दर भावभिनी सुगंधसँ सराबोर टपैक रहल अछि - समूचा वातावरण में जेना कामदेव किछु विशेष छटा पसैर देने होइथ, रति संग विचरण करैत समूचा संसारके अपन विशेष पुष्पवाणसँ बेध के कामित-कल्पित सुधारसमें डूबा देने होइथ। ऊपर सँ होलीके खुमारी - रंग-अबीर आ भांगक मद पसरि रहल अछि। मुनिगामें फूल - लिचीमें मज्जर - नेबो में मज्जर - सुन्दर-सुहावन फूल चारू दिस खिलल - सभ गाछ-वृक्ष नवपल्लवसँ लदब शुरु भऽ गेल अछि। वातावरणमें प्रकृति एहेन सुगंध पसारने आ ताहिपर सँ पछवा हवा के झोंक - ठोड़ धिपल, रक्त-संचार तीव्र, आँखि लड़लड़, प्रेयसी ओजसँ भरल चारुकात देखाय लागलि छथि। सजनीके कोनो वस्तु नीक नहि लागि रहल छन्हि - बस एकटकी सजनाके बाट जोहय लगलीह छथि। लोक के कि कहू - चरा-चुनमुनी-जीव-जन्तु सभ अपन बिपरीतलिंगीके तरफ आकर्षित होइत मानू प्रकृति द्वारा प्रदत्त विशिष्ट प्रजननशक्तिसँ लवरेज केवल किछु क्षण प्रेममें डूबय चाहि रहल अछि। हाय रे बसन्त! बसन्तके पूर्वैयाके शीतलता तऽ आरो मारूख! जनलेवा! बस स्नेहीजन अपन खोंतामें गुप्तवास-सहवास लेल आतूर छथि। कोयली के कुहू-कुहू एहि मस्त वातावरणमें प्राकृतिक संगीतके धुन भरैछ। अपन धुनसँ प्रेमी-प्रेयसीकेँ मानू किछु विशेष दिव्य संदेश प्रदान कय रहल हो। यैह मासमें कोयली सेहो अपन डीम पाड़ैछ। लेकिन फगुवाके धुनकीके इलाज लेल प्रकृति नीमक टूस्सी - मुनिगाके फूल सेवन लेल कहैछ तऽ मिथिलाके निछच्छ गाममें भाँग सेवनके विशेष परंपरा चलैछ। हर तरहें तीव्र रक्त संचारकेँ अपन नियंत्रणमें राखय लेल विवेकी मनुष्य तत्पर रहैछ। एहि मासक दुपहरिया आ अर्द्धरात्रि विशेष रूपसँ ऊफान पर रहैछ - चारू कात जखन सभ किछु शान्त रहैछ ताहि घड़ी प्रेमी-प्रेयसी एक-दोसरके स्मृतिमें डूबल ओ सजल नेत्र सँ एक-दोसरक दिव्यताके दर्शन लेल व्याकुल रहैछ। हवाके रुइख एहेन जे असगरे घूमैत किछु नजैर पर चैढ गेल तँ मदमस्तीमें आँखि भैर जैछ। खेत आ गाछी भ्रमण के विशेष चलन मिथिलाके बसन्तक अलगे शान - भ्रमित घूमैत युवा लेल अलगे ध्यान के परिचायक एहि मासकेँ होलीके रंग आ रगड़ संग रभस मात्र ओरिया सकैत अछि। होलीके आगमन जौँ -जौँ नजदीक भेल जा रहल अछि - बसन्त तौँ-तौँ परवान चढल जा रहल अछि। गीतक बोल फगुआ के रस घोरैछ आ चैतावर सऽ शमन करैछ। एहेन में कोयली जँ अर्द्धरात्रिकाल कुहकय तऽ प्रेयसीकेँ तामस चढब उचिते कहल गेल छैक। तामसो एहेन जे भिनसर होइते ओकर खोता उजड़बा देतीह। हाय रे प्रकृति! हाय रे बसन्त! हार रे रस-मद भरल मधुमास! आ, हाय रे कोयलियाके कुहुकब!

लेकिन चिन्ता नहि करू हे सन्त-ज्ञानीजन! पहिले तऽ होली दिन भीतरका अहंरूपी हिरण्यकशिपुके मारैत आत्मारूपी प्रह्लादके रक्षार्थ प्रभुजी स्वयं नरसिंहरूपमें खंभा फाड़िके प्रकट हेताह आ तदोपरान्त खेलल जायत दानवकेर खून सँ होली आ रिझायल जायत प्रह्लादकेँ - आ फेर सभके अवलम्ब राम स्वयं अवतरित हेताह चैतक नवमी अर्थात्‌ रामनवमी!

स्मरण करब हम सभ - सीताराम चरित अति पावन - मधुर सरस अरु अति मनभावन!

हरिः हरः!

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