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जय मिथिला जय मैथिली

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शुक्रवार, 30 मार्च 2012

भूत - वर्तमान ( कविता )

लाल कक्का पहिने कहय छलथि -
हमर बच्चा अंग्रेजी म बडड चरफर अछि
मैथिली नहिं आबेति छन्हि त की हेतेय
आई काल्हि त अंग्रेजीए सभ किछु छई
कतौ कुनु ठाम कमा खठा के जी लेतेय
आशिक राज -
ई सोचि ओ अपना बच्चा के
मिथिला के संस्कार नहिं देलेनि
ई देखि दाँतय आँगुर
कटलौंपरिणाम देखु की भेलेनि
बच्चा अंग्रेजी पढ़ला के बाद कहय छथि -
गाम म जायब त माटि लागि जायत
शहर म रहिके कलम खोसबाक
चाही माँ बाप क अनला स इज्जत पर पड़त
इज्जत क लेल कुकुर पोषबाक चाही
आब कक्का कहि रहल छथि -
मैथिली मिथिला के मर्म नहिं
जनलौंसजा ओकरे ई भेटि रहल अछि
साँस चलेति अछि तैं जीबय छी
नहिं पुछु जिनगी कोना कटि रहल अछि
समाप्त
आशिक’राज ’

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