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जय मिथिला जय मैथिली

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गुरुवार, 22 मार्च 2012

बेटी पराया धन

कए साल स सुनइत आइब रहल छी,
बेटि त पराया धन होइत अछि ,
जकरा हम सहेजइ छी, संभारइ छी ,
अपन जान स बेसी मानैत छी ,
और फेर चैल जाइत अछि वो एक दिन,
अपन तथाकथित स्वामीक लग|

मुदा एक बात के उत्तर देता कियो हमरा ,
भला किएक कियो अपन धन के ,
वापस लय में सेहो धन माँगइत अछि ,
या फेर अपन धन के अनैहते ,
जर्बैत अछि या घर स निकाइल बाहर करइत अछि |

यदि नय त किएक दहेज के आइग में ,
जरइत अछि हजारो बेटि,
या दर दर ठोकर खाय के लेल मजबूर अछि ,
अपन बाबु के वो राजदुलारी ,
दोष नियत के अछि या अय समाज़ के ,
की यशोदा सेहो आन बुझलक ,
और देवकी सेहो नय अपनेलक |
निशांत झा

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