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जय मिथिला जय मैथिली

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गुरुवार, 15 मार्च 2012

गजल

आई काल्हि तँ राजनीतिक बाजार बहुत गर्म अछि
देखू नेता सभहँक हाल बनल बड्ड बेशर्म अछि

चानन टिका लगा कs ओ बनल बडका-बडका भक्त
नहि पुछू एहि संसार में केने कतेक कुकर्म अछि

जए अछि कर्मयोद्धा धीर बीर, ओ बजैत नहि अछि
चुप्प भs करैत सदिखन अपन-अपन कर्म अछि

भैय्यारी आ सद्भावना इ तँ सबसँ बड़का प्रेम अछि
जे लडाबए एक दोसर सँ ओ नहि कोनो धर्म अछि

हम छी मैथिल, आ नहि कोनो आन हमर धर्म अछि
सपनो में एकरा त्यागि,सबसँ बडका अधर्म अछि
- - - - - - - - -- - वर्ण-२० - - - - - - - -
***जगदानन्द झा 'मनु'

· · · Yesterday at 17:18

1 टिप्पणी:




  1. भैय्यारी आ सद्भावना, इ तँ सबसँ बड़का प्रेम अछि ।
    जे लड़ाबए एक दोसर सँ, ओनहि कोनो धर्म अछि ।।


    बहुत नीक गजल ।

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