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जय मिथिला जय मैथिली

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बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

मिथिलामे जाति-पाति



ई मात्र विडंबना कहु वा कोनो अभिशाप, जे राजनैतिक आजादी भेटलाक ६६ वर्ख बादो हम मिथिलाबासी अपन सोचकेँ जाति-पातिसँ ऊपर नहि  उठा पाबि रहल छी |
मात्र राजनैतिक आजादी ऐ कारणे जे राजनैतिक रूपसँ हम स्वतन्त्र छी परञ्च आर्थिक रूपसँ हम एखनो पराधीन छी | आर्थिक पराधीनता | अर्थात हम अपन इच्छानुसार खर्च नहि कए  सकै छी, मने धनक अभाब | हमरो मोन होइए अपन बच्चाकेँ  कॉन्वेंट स्कूलमे पढ़ाबी मुदा नहि पढ़ा सकै छी,   थिक आर्थिक पराधीनता | हमर मोन होइए नीक मकानमे रही मुदा नहि किन सकैत  छी,   थिक आर्थिक पराधीनता | हमर मोन होइए हमरो लग मोटर साईकिल, कार हुए, हमरो कनियाँ-बच्चा नीक कपड़ा पहिरथि मुदा नहि,   थिक आर्थिक पराधीनता |
स्वाधीनता कए ६६  वर्ख  बादो आर्थिक पराधीनता किएक ?
की हमरा लग बिद्या कम अछि ?
की हम कोनो राजनेता नहि बनेलहुँ ?
की हम प्राकृतिक रूपेण उपेक्षित छी ?
उपरोक्त सभ  बात गलती अछि | विद्यामे हम केकरोसँ कम नहि छी | राजनीतीकेँ  खेती अपने खेतमे होइए | प्राकृतिक कृपा अपन धरती पर पूर्ण रूपेण अछि |
तखन किएक ? किएक हम स्वाधीनता कए ६६ वर्ख  बादो, आर्थिक पराधीनताक जीवन जिबैक लेल बेबस छी |
एखनो बच्चाकेँ  चोकलेट नहि आनि हम कहैत छीयै, दाँत खराप भए  जेतौ | कमी चोकलेटमे नहि, कमी हमर जेबीमे अछि |
आ ई  आर्थिक पराधीनताक एक मात्र कारन अछि, हम मिथिला बासिक सोचब तरीका | आजुक युगमे जहिखन मनुख चान-तारा पर अपन पएर  राखि चूकल अछि, हम मिथिलाबासी एखन धरि  जाति-पातिकेँ  सोचिसँ ऊपर उठै हेतु तैयार नहि छी |
बाभन-सोलकन्हकेँ  नामपर बिबाद | अगरा-पिछराकेँ  नामपर बिबाद | ऊँच-नीचकेँ  नामपर बिबाद |
कोनो काजकेँ  लए  कऽ  आगू  बढ़ू, जेकरा नापशन्द भेल, जाति-पातिकेँ  नामपर बखेड़ा  ठार  कए  दएत | आ ई  कोनो अशिक्षित नहि बहुत पढ़ल-लिखल वर्गोंसँ नहि दूर भए  रहल अछि | शिक्षित माननीयव्यक्ति सभ  चाहे कोनो जातिक हुअए, अपन-अपन जाति कए झंडा लए  कऽ आगू  आबि जाइत छथि |
यदि हम स्वयं व अपन मिथिला समाजकेँ  विकसित व विकासशील देखए चाहै छी तँ  जाति-पातिक झंझटसँ निकलि कए  एक जुट भए आगू  बढ़य परत |
एक संगे चलैमे मतभेद स्वभाबिक छै आ ओकरा दूर केनाइ  निदान्त आबश्यक छै | मुदा ओहि  मतभेदमे जातिकेँ  बिचमे नहि आनि कए  व्यक्तिगत आलोचना, समालोचना करबा चाही  |
की कोनो गोट सफल व्यक्तिकेँ  ओकर जातिक नामसँ जानल जाइ  छैक  ?  नै, तँ  सफलताक सीढ़ीपर चलै लेल जाति-पातिक सहारा किएक |
ई जाति-पातिक रस्ता किछु मुठी भरि राजनेताक चालि छन्हि  | हुनकर बात मानी  तँ  हम सभ  अपन विकास छोरि जाति-पातिमे लड़ैत  रहि आ ओ दुस्त राज करैत हमरा सभकेँ  सोधैत रहत |

आलेख - जगदानन्द झा 'मनु'

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