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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

गजल ~~ अमित मिश्र

‎ कोना चमकल रूप सब बुझहS चाहै छै ,
अंग-अंग मे हम्मर गजल रहS चाहै छै
केशक गजरा जानि नै की सब करेतै यै,
मुस्की कए वाण पर इ दिल ढहS चाहै छै ,
पएरक पायल मोनक मोर नचाबै यै ,
डाँरक लचकी कए बिजुरी सहS चाहै छै ,
पाकल आम छी हरियर-पियर सुट मे ,
प्रेमक मथनी सँ प्रेम दही महS चाहै छै ,
राति अमावस मे पुनिम बनि कS एलौँ यै ,
चलि आउ मोर अंगना दिल कहS चाहै छै ,
परी बनि सपना मे सबहक अहाँ आबै छी ,
"अमित " तS सदिखन सुतले रहS चहै छै . . . । ।
अमित मिश्र

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