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जय मिथिला जय मैथिली

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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

चल रइ बौआ गाम पर

चल रइ बौआ गाम पर
चढलें किये लताम पर
कहबय चल कक्का के जा क
बैसल छथिन्ह दालान पर
चल ....................................
उम्हर एमहर कत तकई छें
लताम छलय ये थुर्री
खूब खेलो घुरमौरी
कानक निचा थापर लगतऊ
नै त चलय ने ठाम पर
चल .........................
केहन बेदर्दी भेलें रउ छौंरा
पतों के तू झट्लें
अखनो धरी नै हटलें
देखही देखही भैय्या एल्खिन
मार्थुन छौंकी टांग पर
चल ...........................

लेखक : आनंद झा

एही रचना के कोनो ता भाग के उपयोग हमरा स बिना पूछने नै करी
एकर सब टा राईट हमरा लग अछि अपन विचार

1 टिप्पणी:



  1. निस्सन्देह रचना नीक लागल ।


    एही रचना के कोनो ता भाग के उपयोग हमरा स बिना पूछने नै करी

    एकर सब टा राईट हमरा लग अछि अपन विचार जरुर दी यदि कोनो ग


    भाइ नीक रचना थिक आ स्वभविक रूपेँ रचनाकार लऽग कॉपीराइट रहैत छै।

    पर जे पहिल दू पाँती अछि ताहि सँ मिलैत - जुलैत उपयोग आनहु लोक सभ कऽ सकैत छथि, कारण एक गोट पुराण रचना केर पहिल दू पाँती एना छै

    चल गए बुच्ची गाम पर ।
    चढठलेँ किए लताम पर ।

    (श्री हरिनाथजी द्वारा "कनिञा लजाए छी किए" नामक कैसेट मे गाओल गेल अछि ।)

    जवाब देंहटाएं