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जय मिथिला जय मैथिली

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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

गजल

दर्द करेजक देखाएब तs अहाँ जानब की
हमर बात कनी सपनो में अहाँ मानब की

अहाँ कहलौं पुरुषक प्रेम गोबर आ रुई
करेज चीरो कs देखायब तs अहाँ कानब की

दोख एकेटा में होई छैक सबमे कत्तौ नहि
सबके संग हमरो अहाँ ओहि में सानब की

अहाँ कहैत छी सबठाम अन्हारे-अन्हारे छै
इजोरियाके आँखि मुनि अन्हरिया मानब की

एक बेर हमरो पर भरोसा कय कs देखु
प्रेम केकरा कहैत छैक 'मनु' सँ जानब की

(सरल वार्णिक बहार, वर्ण-१७)
जगदानन्द झा 'मनु' : गजल संख्या-२१ 

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