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जय मिथिला जय मैथिली

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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

''बिरह गीत ''

आम गाछ कुहके कारी कोयलिया,
बिजुबन कुह्कई मयूर यौ,

नैहर में कुहके सुन्नरी कामिनी ,
जिनकर बालम परदेश यौ ,

घर के पाछू में कयेथा रे भैया ,
एक कलम चिठ्ठी लिखी देहु यौ ,

चारू कात लिखब हमर मिनतीया,
माँझे ठाम धनि के बियोग यौ ,

घर के पाछू में हजामा रे भैया ,
एक कलम चिठ्ठी चुहुपैब यौ ,

जाही ठाम देखब भैया दस पाँच लोक ,
ओही ठाम चिठ्ठीया नुकैब यौ ,

जाही ठाम देखब एसगर बालम जी,
ओही ठाम चिठ्ठीया देखैब यौ,

चिठ्ठी पढेत बालम मन मुसकाबेथ,
कतेक धनि लिखलैन बियोग यौ ,

लियो राजा लियो राजा अहाँ नौकरिया,
हम जाइब धनि केर उदेश यौ ,

खोलू -खोलू हे ये धनि बज्र केवार,
हम एलहुं अहाँ के उदेश यौ ,

हम कोना खोलब यौ बालम ,
बज्र केवार आँचर सुतल लाल यौ ,

हम ता छलहूँ धनि देस बिदेश ,
कतय सं आइल नन्द लाल यौ ,

अहूँ स सुन्नर छोटका दीयर जी ,
हुनके स भेल नन्द लाल यौ ,
[रूबी झा]

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