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जय मिथिला जय मैथिली

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शनिवार, 7 जनवरी 2012

आब जमाना बदईल गेले।


आब जमाना बदईल गेले यौ,
आब जमाना बदईल गेले।

आब सिस्टर सब sis कहाई छईथ,
भैया दैया नाम झमाई छईथ,                                                                                                                       
बाबूजी ते dad भेला,
बेटी संग ओ क्लबो गेला,
नवयुग के ई रीत निराला,
संस्कार कोसी भसिएला,
छौंरी सबहक टाइट जींस देखि,
छौरा सबटा बहकि गेले,
आब जमाना बदईल गेले यौ,
आब जमाना बदईल गेले।

बुढ़ा-बुढ़ी माँल जायत छईथ,
आइसक्रीम एक संगे खाइ छईथ,
एक दोसर के डाँड हाथ दय,
नैन-मट्ट्क्का सेहो करई छईथ,
रॉक एन राँल के मस्त धुन पर, बुढ्बा
बूढ़ा डांस करे लगले,
बुढ़ा के टनगर डांस देखि,
बुढ्बा पर बुढ़िया छरेप गेलई,
आब जमाना बदईल गेले यौ,
आब जमाना बदईल गेले।
पहिले घोडा चना खाइ छल,
चनों आब सपना भ गेले,
रुखल-सुखल घास-फुस पर,
हड्डी सबटा निकलि गेले,
टीसन जाइ काल बीच राह मे,
घोडा बहुते हकमि गेले,
घोडा लय टमटम के संगे,
जोतला खेत मे गुरकि गेले,
आब जमाना बदईल गेले यौ,
आब जमाना बदईल गेले।

आब गुरुजी “सर” कहाई छईथ,
सर के सर कते बेर फुटले,
गुरु ते गुरे रहि गेला,
चेला सब चीनी भेले,
टास्क बनेने नहि छल मुसरी,
सर के ओकरा डेंग्बय परले,
मुसरी ते मुसरिए छेलखिन,
छनहि क्रुद्ध भय प्रण एक लेलखिन,
सर के साइकिलक चक्का मे,
लाठी ओकरा घुसबे परले,
आब जमाना बदईल गेले यौ,
आब जमाना बदईल गेले।

छौंरियों सब सिगरेट पिबईये,
छौरा सब संग पार्क घूमईये,
बाइक के पाछु मे बैसल,
ब्रेकक लाथे मज़ा मारेये,
एक्कर सब के चालि ने देखु,
बीसों टा बॉयफ्रेंड रखईये,
आब जमाना बदईल गेले यौ,
आब जमाना बदईल गेले।

आइ काल्हिक छौरा के देखियौ,
टीक कटा जुल्फी के रखइये,
पढ़ाई-लिखाई मे साढ़े बाईस,
मोछ मुड़ेने देखियौन ताइस,
गप सुनबई ते भ जायब दंग,
लेकिन सरस्वती छईन्ह मंद,
बैंग्लोरक नामी मंत्री माँल दिस,
“अमित” के सेहो मोन गेलेये,
आब जमाना बदईल गेले यौ,
आब जमाना बदईल गेले।

आब जमाना बदईल गेले यौ,
आब जमाना बदईल गेले।

रचनाकार--अमित मोहन झा
ग्राम- भंडारिसम(वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत।

नोट..... महाशय एवं महाशया से हमर ई विनम्र निवेदन अछि जे हमर कुनो भी रचना व हमर रचना के कुनो भी अंश के प्रकाशित नहि कैल जाय।








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