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जय मिथिला जय मैथिली

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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

‎'' बचपन ''

कतेक नीक छल वो ,
हंसनाई वो खेल वो मुस्कान ,

रहेत छलहूँ एही जग सां दूर,
सबटा गम सां अनजान,

नै त कोनो दुःख छल नै छल कोनो सपना ,
भावुक नै होएत छलो के अछि आन के अपना ,

खेला में होइत छले कखनो हार,
कखनो त होइत छलय जीत ,

कखनो होइत छले झगरा झांटी,
कखनो गबेत छलो हम गीत ,

थोरबा छल लड़ाई थोरबा छल रंग ,
कतेक सुहावन छले सखी सहेली केर संग ,

वो गुड्डा गुड्रिया के कतेक नीक छल खेल ,
वो आम गाछी के अपन संगी सभ सां मेल ,

तखन कतेक करेत छलो माँ बाबु जी क हरान,
कतेक नीक छल हंसनाई आ वो मुस्कान ,
सदीखन रहेत छलो सभ गम सां अनजान .

[रूबी झा ]

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