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जय मिथिला जय मैथिली

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सोमवार, 28 नवंबर 2011

कविता-पाई


आई पाई सँ प्यार
खरीदल जाएत छैक
सम्मान खरीदल जाएत छैक
वस् ! जेबी में हेबाक चाहि
पाई
हमरा नहि चाहि
ई पाईयक दुनियाँ
हमरा नहि चाहि
ई भाराकए दुनियाँ

हम तs वसायव्
अपन एक नव आशियाँ
जाहिठाम प्यार कए अहमियत होई
सम्मान कए पूजा होई
जाहिठाम
ठोड पर हँसी लावैक लेल
ह्रदय सँ आह! नहि निकलै
शब्द बजैक सँ पाहिले
लाबा में नहि बदलै
जाहिठाम
अर्थ कए अर्थ समझल जाए
सबके भीतर
एक प्यारक आशियाँ
बसायल जाई |
*** जगदानंद झा 'मनु'
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