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जय मिथिला जय मैथिली

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गुरुवार, 20 मई 2021

गजल

अहाँ रहूँ घरे हम   ठानि अबै छी
एहि पापी पेट लेल छानि अबै छी

रोटी पर नून नै घी पीबि सपना 
हुनक भोजक मंत्र जानि अबै छी 

कमौआ पुतक लातो सोहनगर 
गरीब घरक कोड़ो गानि अबै छी 

चानि पर तेलक अभाबे केश नै
कनियाँगतक खेत फानि अबै छी 

गप्पक कोनो खतिहान नै भेलैए
'मनु' बैसू हम पीबि पानि अबे छी
(सरल वार्णिक बहर - वर्ण १३)
जगदानन्द झा 'मनु'

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

भक्ति गजल

मैया हमर जगतारनि कल्याणी 

सबहक अहाँ सुधि लेलौं महरानी 


नै हम मिलब माँ बाटक गरदामे

चिंता किए जेकर माय भवानी  


जग ठोकरेलक सदिखन ढेपासन 

देलौं शरण निर्बलके हे दानी


दर्शन अपन दिअ हे अम्बे माता 

नै सोन झूठक चाही नै चानी


धेलक चरण 'मनु' तोहर हे मैया 

नै आब जगमे ककरो हम जानी 

(मात्रा क्रम : २२१२-२२२-२२२)

जगदानन्द झा 'मनु'

रविवार, 12 अप्रैल 2020

मोनक प्रश्न

की कवियो सभक धर्म होइ छै ?
कि सभ कवि बेधर्मी होइ छै ?
हाँ हाँ ई जुनि कहि देब, कविक धर्म
हमरा कविक धर्म नहि
हमरा बुझैके अछि कविके घर्म
धर्म ! ओ धर्म
अहाँक पुरखाक घर्म
जे अहाँके वैष्णव बनेलक
जे अहाँके टीक रखब सिखेलक
जे अहाँके माय भगवतीक सेबक बनेलक
आ जे केकरो गायभक्क्षी बनेलक
ओ धर्म

किएक
अनायास ई प्रश्न किएक ?
आइ देख रहल छी
जाहि कविके दाढ़ी नै भेलैए
ओहो गड़ीया रहल अछि
धर्मके टीक आ चाननके
गड़ीया रहल अछि
धर्मक गप्प करै बलाके
गड़ीया रहल अछि
धर्मक स्थानके
आ धर्म देवीके

कमोबेस मैथिलीक कविक सभक
इहे चालि अछि
हाँ ! कियों चिन्हार
तँ कियों अनचिन्हार अछि
तें पुछए परल ई प्रश्न
की कवियो सभक धर्म होइ छै ?
कि सभ कवि बेधर्मी होइ छै ?
यदि बेधर्मी भेनाई अनिवार्य होय कविके
तँ हमहूँ अपन जनउ तोरि ली
टीक काटि
गड़ीयाबै लागू झा मिसरके
खए लागू पाया आ लेग
कवि बनी की नै
मन बुझए अबे की नै
मुदा अकादमी पुरस्कार
भेटत हमरे
सभ परहत हमरे
कर्मे नहि तँ कुकर्मे
सभ परहत हमरे ।
        *****
        जगदानन्द झा "मनु"

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

कविता - भरल चगेंरी मुरही चुरा


                          || तिलासंक्रान्ति ||
                      " भरल चगेंरी मुरही चुरा "
                                       

उठ - उठ बौआ रै निनियाँ तोर ।
अजुका   पाबनि   भोरे   भोर ।।
पहिने  जेकियो   नहयबे  आई ।
        भेटतौ तिलबा रे मुरही लाइ ।।  उठ....

ई पावनि छी मिथिलाक पावनि
सब  पावनि   सं   बड़का  छी ।
भरल     चगेंरी      मुरही     चुरा
तिलवा   लाई   उपरका   छी ।।

उपर  देहिया  थर - थर  काँपय
        भीतर मनुआँ भेल विभोर ।।  उठ....

   चहल पहल भरि मिथिला आँगन
 अइ पावनि के  अजब मिठाई ।
आई   देत   जे   जतेक   डुब्बी
 भेटतै   ततेक   तिलबा  लाई ।।

मुन्ना   देखि  भरय   किलकारी
            जहिना वन में कोइलिक शोर ।।  उठ...

बुढ़िया   दादी   बजा   पुरोहित
छपुआ साडी   कयलक दान ।
तील चाऊर बाँटथि मिथिलानी
    एहि पावनि केर अतेक विधान ।।

     "रमण" खिचड़ी केर चारि यार संग
              परसि रहल माँ पहिर पटोर ।।  उठ......

  गीतकार
     रेवती रमण झा "रमण"
   

  


शनिवार, 11 नवंबर 2017

मैथिलि - हनुमान चालिसा





  ||  मैथिलि - हनुमान चालिसा  ||
     लेखक - रेवती रमण  झा " रमण "
                              ||  दोहा ||
गौरी   नन्द   गणेश  जी , वक्र  तुण्ड  महाकाय  ।
विघन हरण  मंगल कारन , सदिखन रहू  सहाय ॥
बंदउ शत - शात  गुरु चरन , सरसिज सुयश पराग ।
राम लखन  श्री  जानकी , दीय भक्ति  अनुराग । ।
               ||    चौपाइ  ||
जय   हनुमंत    दीन    हितकरी ।
यश  वर  देथि   नाथ  धनु धारी ॥
श्री  करुणा  निधान  मन  बसिया ।
बजरंगी   रामहि    धुन   रसिया ॥
जय कपिराज  सकल गुण सागर ।
रंग सिन्दुरिया  सब गुन  आगर  ॥
गरिमा गुणक  विभीषण जानल ।
बहुत  रास  गुण ज्ञान  बखानल  ॥
लीला  कियो  जानि  नयि पौलक ।
की कवि कोविद जत  गुण गौलक ॥
नारद - शारद  मुनि  सनकादिक  ।
चहुँ  दिगपाल जमहूँ  ब्रह्मादिक ॥
लाल  ध्वजा   तन  लाल लंगोटा  ।
लाल   देह  भुज  लालहि   सोंटा ॥
कांधे    जनेऊ    रूप     विशाल  ।
कुण्डल   कान   केस  धुँधराल  ॥
एकानन    कपि  स्वर्ण   सुमेरु  ।
यौ   पञ्चानन   दुरमति   फेरु  ।।
सप्तानन  गुण  शीलहि निधान ।
विद्या  वारिध  वर ज्ञान सुजान ॥
अंजनि  सूत सुनू  पवन कुमार  ।
केशरी   कंत    रूद्र     अवतार   ॥
अतुल भुजा बल ज्ञान अतुल अइ ।
आलसक जीवन नञि एक पल अइ ॥
दुइ   हजार  योजन  पर  दिनकर ।
दुर्गम दुसह  बाट  अछि जिनकर ॥
निगलि गेलहुँ रवि मधु फल जानि  ।
बाल   चरित  के  लीखत   बखानि  ॥
चहुँ  दिस   त्रिभुवन   भेल  अन्हार ।
जल , थल , नभचर सबहि बेकार ॥
दैवे   निहोरा  सँ   रवि   त्यागल  । 
पल  में  पलटि अन्हरिया भागल  ॥ 
अक्षय  कुमार  के  मारि   गिरेलहुं  ।
लंका   में  हरिकंप  मचयल हू ॥
बालिए अनुज अनुग्रह   केलहु  ।
ब्राह्ण   रुपे  राम मिलयलहुँ  ॥
युग  चारि  परताप  उजागर  ।
शंकर स्वयंम  दया के सागर ॥
सूक्षम बिकट आ भीम रूप धारि ।
नैहि  अगुतेलोहूँ राम काज करि  ॥
मूर्छित लखन  बूटी जा  लयलहुँ  ।
उर्मिला  पति  प्राण  बचेलहुँ  ॥
कहलनि  राम उरिंग  नञि तोर ।
तू तउ भाई भरत  सन  मोर   ॥
अतबे कहि  द्रग  बिन्दू  बहाय  ।
करुणा निधि , करुणा चित लाय ॥
जय  जय  जय बजरंग  अड़ंगी  ।
अडिंग ,अभेद , अजीत , अखंडी ॥
कपि के सिर पर धनुधर  हाथहि ।
राम रसायन सदिखन  साथहि ॥
आठो सिद्धि नो निधि वर दान ।
सीय मुदित चित  देल हनुमान ॥
संकट   कोन ने  टरै  अहाँ   सँ ।
के बलवीर  ने   डरै   अहाँ  सँ  ॥
अधम उदोहरन , सजनक संग ।
निर्मल - सुरसरि जीवन तरंग ॥
दारुण - दुख दारिद्र् भय मोचन ।
बाटे जोहि थकित दुहू  लोचन ॥
यंत्र - मंत्र  सब तन्त्र  अहीं छी ।
परमा नंद स्वतन्त्र  अहीं  छी  ॥
रामक काजे  सदिखन आतुर ।
सीता  जोहि  गेलहुँ   लंकापुर  ॥
विटप अशोक शोक बिच जाय ।
सिय  दुख  सुनल कान लगाय ॥
वो छथि  जतय , अतय  बैदेही ।
जानू  कपीस  प्राण  बिन देही  ॥
सीता ब्यथा  कथा सुनि  कान ।
मूर्छित अहूँ  भेलहुँ  हनुमान ॥
अरे    दशानन   एलो   काल  ।
कहि बजरंगी  ठोकलहुँ  ताल ॥
छल दशानन  मति  के आन्हर ।
बुझलक  तुच्छ अहाँ  के  वानर ॥
उछलि कूदी कपि लंका जारल ।
रावणक सब मनोबल  मारल  ॥
हा - हा  कार  मचल  लंका  में  ।
एकहि टा  घर बचल लंका में  ॥
कतेक कहू कपि की -,की कैल ।
रामजीक काज सब सलटैल  ॥
कुमति के काल सुमति सुख सागर ।
रमण ' भक्ति चित करू  उजागर ॥
               ||  दोहा ||
चंचल कपि कृपा करू , मिलि सिया  अवध नरेश  ।
अनुदिन अपनों अनुग्रह , देबइ  तिरहुत देश ॥
सप्त कोटि महामन्त्रे ,  अभि मंत्रित  वरदान ।
बिपतिक  परल पहाड़ इ , सिघ्र  हरु  हनुमान ॥


          ॥  दुख - मोचन  हनुमान   ॥ 

  जगत  जनैया  , यो बजरंगी  ।
  अहाँ  छी  दुख  बिपति  के संगी
  मान  चित  अपमान त्यागि  कउ ,
  सदिखन  कयलहुँ  रामक काज   । 
   संत  सुग्रीव  विभीषण   जी के,   
   अहाँ , बुद्धिक बल सँ  देलों  राज  ॥ 
   नीति  निपुन  कपि कैल  मंत्रना  
   यौ  सुग्रीव  अहाँ  कउ  संगी  
                   जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

  वन अशोक,  शोकहि   बिच सीता  
  बुझि  ब्यथा ,  मूर्छित  मन भेल  ।
  विह्बल   चित  विश्वास  जगा  कउ
  जानकी     राम     मुद्रिका    देल  ॥
  लागल  भूख  मधु र फल खयलो  हूँ
  लंका   जरलों   यौ   बजरंगी   ॥
                   जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

   वर  अहिरावण  राम लखन  कउ
   बलि प्रदान लउ  गेल  पताल  ।
   बंदि  प्रभू   अविलम्ब  छुरा कउ
   बजरंगी कउ  देलौ कमाल  ॥
   बज्र  गदा  भुज बज्र जाहि  तन 
   कत  योद्धा मरि  गेल  फिरंगी  , 
                   जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

 वर शक्ति वाण  उर जखन लखन , 
 लगि  मूर्छित  धरा  परल निष्प्राण । 
 वैध   सुषेन  बूटी   नर  आनल  ,
 पल में पलटि  बचयलहऊ प्राण  ॥ 
 संकट   मोचन  दयाक  सागर , 
 नाम  अनेक ,  रूप बहुरंगी  ॥ 
             जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

नाग फास  में  बाँधी  दशानन  , 
राम   सहित  योद्धा   दालकउ । 
गरुड़  राज कउ   आनी  पवन सुत  ,
कइल    चूर    रावण   बल  कउ 
जपय     प्रभाते   नाम अहाँ  के ,
तकरा  जीवन  में  नञि  तंगी   ॥ 
                     जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

ज्ञानक सागर ,  गुण  के  आगर  ,
शंक   स्वयम   काल   के  काल  । 
जे जे अहाँ  सँ  बल बति यौलक ,
ताही   पठैलहूँ   कालक  गाल   
अहाँक  नाम सँ  थर - थर  कॉपय ,
भूत - पिशाच   प्रेत    सरभंगी   ॥ 
                      जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ---- 

लातक   भूत   बात  नञि  मानल ,
पर तिरिया लउ  कउ  गेलै  परान  । 
कानै  लय  कुल नञि रहि  गेलै  , 
अहाँक  कृपा सँ , यौ  हनुमान  ॥ 
अहाँक भोजन आसन - वासन ,
राम नाम  चित बजय  सरंगी  ॥ 
                 जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

सील   अगार  अमर   अविकारी  ,
हे   जितेन्द्र   कपि   दया  निधान  । 
"रावण " ह्र्दय  विश्वास  आश वर ,
अहिंक एकहि  बल अछि हनुमान  ॥ 
एहि   संकट   में  आबि   एकादस ,
यौ   हमरो   रक्षा   करू   अड़ंगी  ॥ 
                    जगत  जनैया --- अहाँ  छी दुख ----

  ||  हनुमान  बन्दना  ||

जय -जय  बजरंगी , सुमतिक   संगी  -
                       सदा  अमंगल  हारी  । 
मुनि जन  हितकारी, सुत  त्रिपुरारी  -
                         एकानन  गिरधारी  ॥ 
नाथहि  पथ गामी  , त्रिभुवन स्वामी  
                      सुधि  लियौ सचराचर   । 
तिहुँ लोक उजागर , सब गुण  आगर -
                     बहु विद्या बल सागर  ॥ 
मारुती    नंदन ,  सब दुख    भंजन -
                        बिपति काल पधारु  । 
वर  गदा  सम्हारू ,  संकट    टारू -
                  कपि   किछु  नञि   बिचारू   ॥ 
कालहि गति भीषण , संत विभीषण -
                          बेकल जीवन तारल  । 
वर खल  दल मारल ,  वीर पछारल -
                       "रमण" क किय बिगारल  ॥ 

                ||  हनुमान - आरती  ||

आरती आइ अहाँक  उतारू , यो अंजनि सूत केसरी नंदन  । 
अहाँक  ह्र्दय  में सत् विराजथि ,  लखन सिया  रघुनंदन   
             कतबो  करब बखान अहाँ के '
            नञि सम्भव  गुनगान  अहाँके  । 
धर्मक ध्वजा  सतत  फहरेलौ , पापक केलों  निकंदन   ॥ 
आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
          गुणग्राम  कपि , हे बल कारी  '
          दुष्ट दलन  शुभ मंगल कारी   । 
लंका में जा आगि लागैलोहूँ , मरि  गेल बीर दसानन  ॥ 
आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
         सिया  जी के  नैहर  , राम जी के सासुर  '
         पावन  परम ललाम   जनक पुर   । 
उगना - शम्भू  गुलाम जतय  के , शत -शत  अछि  अभिनंदन  ॥ 
आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---
           नित आँचर सँ  बाट  बुहारी  '
          कखन आयब कपि , सगुण  उचारी  । 
"रमण " अहाँ के  चरण कमल सँ , धन्य  मिथिला के आँगन ॥ 
 आरती आइ ---  , यो  अंजनि ---- अहाँक --- लखन ---


रचनाकार -
रेवती रमण झा "रमण "
मो no - 91 9997313751

हम मूर्ख समाजक वाणी छी

|| हम  मूर्ख  समाजक वाणी छी || 
हम  मुर्ख समाजक वाणी  छी  | 
ज्ञाता जन छथि सदय कलंकित 
हमहीं  टा    बस   ज्ञानी    छी || 
                     हम  मुर्ख ---  || 
रामचंद्र    के   स्त्री    सीता  
तकरो      कैल    कलंकित  | 
कयलनि डर सं अग्नि परीक्षा 
भेला    ओहो    शसंकित    || 
एक्कहि  ठामे  गना दैत  छी 
सुर   नर   मुनि  जे   ज्ञानी | 
हम कलंकित सब  के कयलहुँ 
देखू      पलटि     कहानी  ||  
बुद्धिक-बल   तन  हीन  भेल 
बस आप  नौने  सैतानी छी | 
                  हम  मुर्ख ---|| 
बेटा  वी. ए. बैल हमर अछि 
हम   फुइल    कय  तुम्मा  | 
नै  केकरो  सँ  हम  बाजै छी 
बाघ   लगै    छी    गुम्मा  || 
अनकर  बेटा   कतबो बनलै 
 रहलै       त         अधलाहे | 
अगले    दिन उरैलहुँ  हमहीं 
कतेक    पैघ     अफवाहे  || 
अपनहि मोने,अपने उज्ज्वल 
बस   हम   सब  परानी  छी | 
                   हम  मुर्ख ---  ||   
बाहर  के कुकरो  नञि पूछय 
गामक       सिंह       कहबी  | 
परक    प्रशंसा  पढ़ि  पेपर में 
मूँह    अपन     बिचकावी   || 
सदय इनारक फुलल  बेंग सन 
रहलों        एहन        समाज  |
आनक   टेटर  हेरि  देखय लहुँ 
अप्पन       घोलहुँ       लाज | | 
अधम मंच  पर बैसल हम सब 
पंडित  जन  मन  माणि  छी | 
                        हम  मुर्ख --- ||  
गामक    हाथी  के  लुल्कारी  
जहिना      कुकर     भुकय  | 
बाहर   भले  देखि कय हमर 
प्रभुता    पर   में     थुकय  || 
अतय   सुनैने  हैत ज्ञाण की 
वीघर  छी   कानक     दुनू  |
 कोठी  बिना अन्न केर बैसल 
ओकर     मुँह    की    मुनू  || 
हम  आलोचक   पैघ सब सँ 
हमहीं     टा      अनुमानी  || 
                 हम  मुर्ख --- || 
माली  पैसथि  पुष्प  वाटिका 
सिंचथि        तरुवर       मूल | 
पंडित   पैसथि  पुष्प  वाटिका 
लोढथि      सुन्दर      फूल  | | 
लकरिहार  जन  लकड़ी  लाबय 
चूइल्ह       जेमबाय      गामें  |
 सूअर    पैसय    पुष्प  वाटिका 
विष्ठा         पाबय       ठामे  || 
जे अछि  इच्छु  जकर तेहन से 
दृष्टि      ताहि    पर     डारय | 
मूर्खक  हाथ  मणि अछि पाथर 
ज्ञानी       मुकुट      सिधारय  || 
"रमण " वसथु जे एहि समाज में 
मर्दो    बुझू      जनानी      छी  | 
हम   मुर्ख समाजक  वाणी  छी 
                       हम  मुर्ख ---|| 
 रचनाकार -:


रेवती रमन झा "रमण " 
गाम- जोगियारा पतोंर दरभंगा ।
मो - 9997313751 

सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

गजल

प्रेम कलशसँ अमरित अहाँ पीया तँ दिअ
मुइल जीवन फेरसँ हमर जीया तँ दिअ 
   
काल्हि नै बाँचत शेष जीवन केर किछु
एकटा सुन्नर सन अपन धीया तँ दिअ
 
रहअ दिअ हमरा आब चाही प्राण नै 
मैरतो  बेरीया अपन हीया तँ दिअ

प्राण बिनु देहक हाल देखू आब नै
बाटपर ओगरने आँखिकेँ सीया तँ दिअ 

जाइ छी ‘मनु’ पाछूसँ  नै टोकब अहाँ 
अपन हाथसँ काठी कने दीया तँ दिअ
(बहरे हमीम, मात्रा क्रम : २१२२-२२१२-२२१२)
जगदानन्द झा 'मनु'

सोमवार, 15 मई 2017

भक्ति गजल

हम्मर अँगना मैया एली
गमके चहुदिस अरहुल बेली

धन हम छी धन हम्मर अँगना 
मैया जतए दर्शन देली

आबू बहिना संगी हम्मर 
मैया संगे    सामाँ खेली 

जे किछू अछि एखन हमरा ल'ग 
ओ  सबटा  मैया   द'क  गेली

बड़ भागसँ 'मनु' भेटल अवसर 
मैया अप्पन   चरण लगेली

(सब पाँतिमे आठ-आठटा दीर्घ, मकताक दोसर पाँतिमे दूटा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानक छूट लेल गेल अछि)
जगदानन्द झा 'मनु'

शनिवार, 6 अगस्त 2016

गजल

बनेलहुँ अपन हम जान अहाँकेँ
जँ कहि लाबि देबै चान अहाँकेँ

हँसीमे सभक माहुर झलकैए
सिनेहसँ भरल मुस्कान अहाँकेँ

कमल फूल सन गमकैत अहाँ छी
जहर भरल आँखिक बाण अहाँकेँ

पियासल अहाँ बिनु रहल सगर मन
सिनेहक तँ चाही दान अहाँकेँ

करेजक भितर 'मनु' अछि कि बसेने
रहल नै कनीको  भान अहाँकेँ 
(मात्रा क्रम ; १२२-१२२-२१ १२२)
(सुझाव सादर आमंत्रित अछि)
© जगदानन्द झा 'मनु' 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

बेटाक बाप


        "ई जे भरि दिन नेतागिरीमे लागल रहै छी कि एहिसँ पेट भरत? चलू अप्पन पेटक आगि तँ जेना तेना मिझा लेब कनिक बेटीक ब्याहो केर चिंतासँ तँ डरू । भेल तँ ३-४ वर्खमे ओकरो ब्याह करए परत, ओहु लेल १०-१५ लाख रूपैया चाही ।"
         "केहेन गप्प करै छी ? आब ओ ज़माना नहि रहलै । बेटा आ बेटीमे फराके की? जेना बेटाक पढ़ाइ-लिखाइ लालन पालनमे ख़र्चा तेँनाहिते बेटीमे । बेटी बेटासँ कतौ कम नहि । आ हम्मर बेटी तँ लाखोमे एक अछि ।"
         "ई अहाँ बुझै छीयै मुदा समाजमे दहेज लोभी बेटाक बाप नहि ।"
© जगदानंद झा 'मनु' 

रभसल

"धूर भौजी ! अहुँ बड़ रभसल जकाँ किनादन करैत रहै छी ।"
"यौ लाल बाबु रहै दियौ, जँ हम एना रभसल जकाँ नहि करितौँ तँ, ई जे कोरामे भतिजाकेँ लदने रहै छी से मनोरथ अहाँक भैया बुते तँ रहिए गेल रहिते ।"
© जगदानंद झा 'मनु' 

मामासार (बीहनि कथा)


मामा आ सार पर केखनो विश्वास नहि करी । इतिहास गबाह अछि । नहि कोनो मामा भगिना के भेलै आ नहि कोनो सार बहिनोइ के भेलै । कंस, शकुनि, बंगाल रियासत केर बादशाह सिराजुदौल्लाक सार(मिर कासीम आ मिर साकी) , जायचन्द आ एहेन एहेन कतेको मामा आ सार घर-घरमे नुकेएल अछि । 
एकटा पूरान फकरा छै, जखन गिदड़के मौत अबै छै तँ ओ शहर दिस भागैत अछि । एहि फकराके आब एना बूझल जेए, जखन कोनो मनुखके बिपैत आबै बला होइ तँ ओ सासुर क भगैए वा सारके पोसैए । सार आ गहुमन साँपमे कोनो फराक नहि । ई दुनू कखन डैस लेत बिधने बुझता । आ जूएस गहुमन भेला मामा । (ई खालि हमर मंतव्य अछि जरूरि नहि जे अहुँ एकरा मानी । मामा अहाँके सार अहाँके जीवन अहाँके मर्ज़ी अहाँकेँ । हम तँ मात्र इतिहास आ अपन मंतव्य शेयर केलहुँ । 😊😊😊)
© जगदानंद झा 'मनु' 

गजल


साँप चलि गेल लाठी पीटे रहल छी
बाप मुइला पछाइत भोजक टहल छी

पानि नै अन्न कहियो जीवैत देबै
गाम नोतब सराधे सबहक कहल छी

आँखिकेँ पानि आइ तँ सगरो मरल अछि
राति दिन हम मुदा ताड़ीमे बहल छी 

कहब ककरा करेजा हम खोलि अप्पन 
नै कियो बूझलक हम धेने जहल छी

सुनि क' हम्मर गजल जग पागल बुझैए
दर्द मुस्कीसँ झपने 'मनु' सब सहल छी 
(बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२)
© जगदानन्दझा 'मनु' 

मंगलवार, 21 जून 2016

हमरा मिथिला राज चाही

भीख नहि अधिकार चाही, हमरा मिथिला राज चाही 
जे हमर अछि खूनमे खूनक अधिकार चाही 

जनक वाचस्पतिकेँ पुत्र हम, हमर चुप्पीकेँ नै किछु आओर बुझू
शांतचित्त हम समुद्र सन, हमर क्रोधकेँ सोनित चाही 

सिंह सन हम बलवान रहितो, मेघ सन हम शांत छी 
जुनि बिसरी ऊधियाइत मेघकेँ, मुठ्ठीमे संसार चाही

जाहि कोखिसँ सीता छथि जनमल, ओहि कोखिक संतान छी 
बाँहिमे प्रज्वलित अछि अग्णि, बस एकटा संकेत चाही 

भूखसँ व्याकुल छी,   मुदा उठाएब नहि फेकल टुकड़ी 
कर्ण बनि जे नहि भेटल, ममता केर अधिकार चाही

माए मैथिली रहती किएक,  निसहाय एना एतेक दिन 
होम करे जे तन मन अप्पन,  'मनु' लव कुश सन संतान चाही
जगदानन्द झा 'मनु'

सोहागिन

हल्द्वानी, हम आ सा । क़ब्रिस्तान पार कय क' हम दुनू पहाड़क उपर चढ़ैत, समतल जगह ताकि पार्ककेँ एकटा वेंचपर बैसि, देहक गर्मीकेँ कम करैक हेतु बर्फमलाइ (आइस्क्रीम) कीन खेनाइ शुरू केलौंहँ ।
दुनू गोटा अप्पन अप्पन आधा बर्फमलाइ खेने होएब कि, सा "जँ हम अहाँक सामने मरि गेलौं तँ हमर सारापर चबूतरा बना देब ।"
मेघ धरि उँच उँच पहाड़, चारू कात प्राकृतिक सौंदर्य, मखमल सन घास, स्वर्गसन वातावरण, बर्फमलाइ केर आनन्दक बिच अचानक एहेन गप्प सुनि, बर्फमलाइ हमर मुँहसँ छूटि हाथमे ठिठैक गेल । कनिक काल सा केर मुँह पढ़ैक असफल प्रयास केलाक बाद; "अवस्य एकटा नीक चबूतरा । जँ हम पहिने मरि गेलौं तँ एतेक व्यवस्था ज़रूर कय जाएब जे एकटा नीक चबू.... "
बिच्चेमे सा हमर मुँहकेँ अप्पन हाथसँ दाबैत, "नीक नहि साधारणे चबूतरा मुदा अहाँक हाथे आ ओहिपर लिखल हुए "सोहागिन सा" ।
@ जगदानन्द झा 'मनु'