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जय मिथिला जय मैथिली

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शनिवार, 21 फ़रवरी 2015


21 फरवरी के मनाबु अप्पन 'मातृ भाषा दिवस'
मिथिला धरोहर : 21 फरवरी यानी कि मातृ भाषा दिवस .. अंहा मे सँ बहुते कम लोग के पता होयत कि आय कोन दिन अछि। आधहा सँ ज्यादा लोग के तऽ फरवरी खाली वैलेंनटाइन डे कs लेल याद रहैत अछि।
आय के दिन अपन माँ भाषा के सेलिब्रेट करैय के अछि। आय के दिन अंहा अपन मातृ भाषा चाहे मैथिलि, अंगिका, भोजपुरी, मगही, वजिजका, जे भी होय ओकरा सेलिब्रेट कऽ सकय छि। कियाकि विविध भाषा के अय मोति के पिरोये कऽ भारत देशक एकता के माला बनय अछि, जय मे प्रेमक धागा होयत अछि।
हिंदी दिवस : हर हिंदुस्तानी के आवाज हिंदी..
मुदा बदलैत परिवेश मे जतय आय लोग के लेल वक्त नय अछि ओतय आय लोग सव भाषा के खिचड़ी कऽ देलक अछि। अंहा अपन आस-पासक लोगक बात पर गौर करव तऽ अंहा पैव जे आय शायदे ही कुनो एहन पुरूष औऱ महिला हैत जे कि शुद्ध भाषा के प्रयोग करैत होयत..जेना कि हिंदी बाजैत समय अंग्रेजी के प्रयोग, मैथिलि बाजैत हिंदी आ इंग्लिश शब्दक प्रयोग।
आय तऽ लोग महिलाओं सँ बात करैत कहैत अछि. आप खा रहे हो..या फेर बड़े सँ बात करैत समयो तू-तड़ाके क प्रयोग करैत अछि जेना कि तू खा ले, आप निकलो वगैरह..वगैरह।
दोसर अहम बात जे आय-काइल हर जगह अछि ओ अछि अंग्रेजी के बोलबाला। भौतिकतावादी युग मे स्टेटस मेंटेन करय के चक्कर मे हम विदेशी भाषा के तऽ तेजी सँ अपना रहल छि कियाकि इ बेहद जरूरी अछि, मुदा अपन पहचान ऑउर अपन मातृभाषा के बिसरैत जा रहल छि।
आय अगर मिथिलांचल दंपति दिल्ली, पुणे ऑउर बैंगलोर मे रहैत अछि तऽ हुनका बच्चा के मैथिलि नय आवैत अछि कियाकि ओ अपन बच्चा के कखनो मैथिलि बाजनय सिखेवे नय केलक, अगर बच्चा कखनो काल नकल करैतो अछि तऽ डांट-फटकार परैत अछि कियाकि हुनका लागैत यऽ जे कि हमर बच्चा मातृभाषा सीखे कs की करत ओकरा अंग्रेजी एवा चाहि कियाकि इहे सँ ओ स्मार्ट कहलैत जहनकि अपन क्षेत्रीय भाषा बाइज के पिछडल लागत।
इ सवटा लोगक ग्रसित मानसिकता कऽ सबूत अछि जेकर कारणे आय हमार क्षेत्रीय भाषा के ओ बढ़ावा नय मिलैत अछ जे कि अंग्रेजी कs मिल रहल अछ। हम देशक आन-बान ऑउर शानक बरकरार राखय के लेल कसम तऽ खाइत छि मुदा की मातृभाषा के अनदेखा कऽ के हम वाकई मऽ अपन सप्पत निभा रहल छि।
जय  मैथिलि  जय  मिथिला 

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

हम कवि नै छी

हम कवि नै छी
वस ! हमरा भीतर किछु आक्रोश अछि
जे समय-समयपर
लाबा बनि फूटि परैत अछि
जँ हम कवि
तँ हमरा एहेन असंख्य आक्रोशी
पटकैत अछि
अपन-अपन आक्रोशकेँ
पाथरपर अपन-अपन हथौरी नेने
जेठक रौदमे पिआसे
माघक बरसाती जाड़मे भूखे
मुदा ओकर कविताकेँ
के सुनैत अछि
सब बौक बहीर बनल
अपन-अपन टेढ़ आँखिसँ देखैत
मनक कोनो कोणमे
हथौरी आ पाथरक
चोटक वेदनाकेँ नुकोने
चलि जाइत अछि
कतौ केकरो कोनो कविक करेजक
आँखिक दुनू कोणा गिल भऽ जाइत अछि
तैयो कविता के सुनैत अछि
नै पाथरक
नै हथोरीक
आ नै भूख पिआससँ विकल पेटक।
©जगदानन्द झा 'मनु'

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

गजल

चाही आश नै कनिको चमत्कारकेँ
मेहनतसँ बसायब अपन संसारकेँ

आजुक नवयुवक हम डरब धमकीसँ नै
छोरब नै अपन कनिको तँ अधिकारकेँ

बुझि अप्पन कियो छनमे करेजा ल' लिअ
टेढ़ीमे जँ छी नै सहब सरकारकेँ

धरतीपर जते बासन पकल काँच छै
एक्के हाथ सगरो गढ़ल कुम्हारकेँ

सहलों चोट सय भरि जन्म सोनारकेँ
'मनु'  के सहत एक्को चोट लोहारकेँ

(बहरे कबीर, मात्रा क्रम; २२२१-२२२१-२२१२)
जगदानन्द झा 'मनु'