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जय मिथिला जय मैथिली

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रविवार, 14 सितंबर 2014

काल


छोरु गौरवमय गाथा भूतकाल केर
आब जीवू वर्तमानमे
जरल जुन्ना जकाँ ऐँठल
देखैएमे खाली
छुबैत मातर जे छाउर बनि जए

जितैक लेल मान दान आ प्रतिस्था
पाछू जुनि,
देखू आगूक
ओहो तँ कियो छैक
जे चानकेँ छुलक
तँ हमहीँ कहिया धरि
चानक पूजा करब
ओहो तँ कियो छैक
जे मंगलपर पेएर रखलक
तँ हमहीँ  कहिया धरि
मंगलकेँ अमंगल मानि
काज नहि करब
ओहो तँ कियो छैक
जे पाँतिक आगू चलैत छैक
तँ हमहीँ कहिया धरि
झंडा लऽ कऽ पाँतिक पाछू चलब

मानलहुँ हमर भूत
बड़ नीक आ उत्तम छल
मुदा वर्तमान किएक एहेन अछि  
आबू देखू, बैस कए सोचू
कि सनेस हम अपन भविष्यकेँ देब ?
जँ रहलहुँ चूप
हाथपर हाथ धेने
तँ ओकरा लग
कोनो नीक भूतो नहि रहत
आ जाकरा लग
वर्तमान आ भूत दुनू शून्य
ओहि लोकक
ओहि संस्कृतिक
आ ओहि समाजक लुप्त भेनाइ
अवस्यसम्भाविक छैक
आब अहीँ कहू
कि हम सभ
हमर सबहक संस्कृति
हमर समाज, कि लुप्त भए जाएत ?
कि लुप्त भए जाएत ?
कि लुप्त भए .......
© जगदानन्द झा ‘मनु’