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जय मिथिला जय मैथिली

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बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

गजल

लदने नै अनेरे लाश छी कान्हपर
जीवन केर सबटा आश छी कान्हपर

दिन भरि जे कमेलौं ओकरे दाम अछि
ढाकीमे बुझू नै घास छी कान्हपर

खूजल उक जकाँ  कोना फरफराइ छी
नै रखने मनुक्खक भाष छी कान्हपर

भैया भेल नेता आब नै हम डरब
रखने हाथ सदिखन खास छी कान्हपर

कुक्कुर पोसि नव-नव साहबी केर ‘मनु’
दू कट्ठा बचेने चास छी कान्हपर 

(बहरे कबीर, मात्रा क्रम – २२२१-२२२१-२२१२)
जगदानन्द झा ‘मनु’  

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

गजलक लहास


कलानन्द भट्ट कृत गजल संग्रह कान्हपर लहास हमर केर आलोचना, आलोचक/समीक्षक जगदानन्द झा मनु

हमरा पढ़क शौभाग्य भेटल कलानंद भट्ट कृत गजल संग्रह कान्हपर लहास हमर जे की १९८३मे प्रकाशित भेल अछि। एहि गजल संग्रहमे कलानंद भट्ट जीक गजल प्रति सम्बोधन गजलक मादेक अलाबा कुल ४८टा गजल वा गजल सन किछु अछि। भट्टजी अप्पन संबोधन गजलक मादेमे तँ विभक्ति सटा कए लिखने छथि मुदा बाद बांकी गजल सभमे विभक्ति शब्दसँ हटा कए लिखल अछि। ई संकेत अछि हुनक वा हुनक समकालीन मैथिली लेखकक द्वारा गद्य आ पद्यमे मैथिली प्रति कएल गेल अन्तर।
एहि संग्रहक मादे, गजलक व्याकरण पक्षपर अबैत छी। एक गोट गजल लेल सभसँ आवश्यक अछि काफिया आ रदीफक पालन मुदा एहि संग्रहक किछु गिनतीक गजल छोरि कए बाद बांकी गजलमे काफिया आ रदीफक दोख अछि।

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

गजल


कोना अहाँकेँ घुरि कहब आबै लेल
बड़ दूर गेलहुँ टाका कमाबै लेल

नै रीत कनिको प्रीतक बुझल पहिनेसँ
टूटल करेजा अछि किछु सुनाबै लेल

लागल कपारक ठोकर जखन देखलहुँ
नै आँखिमे नोरक बुन नुकाबै लेल

बुझलहुँ अहाँ बैसल मोनमे छी हमर
ई दूर गेलहुँ हमरा कनाबै लेल

कोना कऽ ‘मनु’ कहतै आब अप्पन दोख
घुरि आउ फेरसँ दुनियाँ  बसाबै लेल

(बहरे- सलीम, मात्रा क्रम-२२१२-२२२१-२२२१)                             
जगदानन्द झा मनु’

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

अनमोल झा जीक पोथी “टेकनोलजी”क समीक्षा


समीक्षक – जगदानन्द झा मनु’
मिथिला संस्कृतिक परिषद, कोलकत्ता द्वारा प्रकाशित श्री अनमोल झा जीक लघुकथा संग्रह टेकनोलजी एखन हमरा हाथेमे अछि। पाँछाक तीन दिनसँ लगातार एकरा पढ़ि रहल छी। सुन्नर कवर पेंजसँ सजल तेहने भीतरक कथा सभ एकसँ एक उपरा उपरी।
सबसँ पहिने अनमोल जीकेँ एहि --- कथा संग्रह हेतु बहुत बहुत बधाइ आ संगे संग मंगल कामना जे मैथिली साहित्यमे दिनो दिन ओ शुक्ल पक्षक चाँन जकाँ उदयमान होइत रहथि।
मिथिलांचल टुडे टीमक तरफसँ हमरा एहि पोथीक समीक्षा केर दायित्व भेटल। हमरा लेल ई कठिन काज आ ओहूसँ बेसी कष्टकर छल बिना कोनो पक्ष बिपक्षमे गेने तटस्थ एहि पुस्तककेँ समीक्षा केनाइ। हमरामे कौशल आ शहास दुनूक अभाब मुदा माँ सरोस्वती आ गुरुदेवकेँ सुमिरैत अपन आँखिकेँ पोथीक पन्नापर आ कलमकेँ कागदपर चलबए लगलहुँ।
अनमोल जीक समर्पण देख मोन गदगद भए गेल। जतए आजुक नव पीढ़ी अपन माए बाबूकेँ बोझ बुझि रहल अछि ओहिठाम अनमोल जीक