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जय मिथिला जय मैथिली

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शुक्रवार, 28 जून 2013

बदमाश प्रकृति

आइ भोरे अखबारमे छपल छल एकटा बात
खसल ठनका मरल जनता काँपल हमर गात
अहाँ बदमाश बनब तँ प्रकृतियो छै बदमाश
गाछ-बिरिछ जे काटब एहिना हेतै सत्यानाश
कतौ बाढ़ि आएत आ कतौ आएत भारी भुकम्प
जन शुन्य भऽ जेतै धरती भऽ जाउ सकदम्म
मीत बनाबू प्रकृतिकेँ बनबै अहाँ खुशहाल
प्रकृति बचबऽ लेल अहाँ करू हड़ताल

अमित मिश्र

गुरुवार, 27 जून 2013

दू लाख महिना



माए तामससँ लाल भेल, “मार कपर जडुआ, बी०ए० एहि दुआरे करेलीयहुँ जे पढ़ि लिख कऽ गाममे महिस पोसेँ। देखही ललनमाकेँ मुम्बईमे  नोकरी करै छै, भोकना दिल्लीमे नोट छाइप रहल छै, ओ रमेशरा कलकत्तामे डिलर बनि गेलै आ ई एतेक पढ़ि लिख कए कहैत अछि गाममे रहत, रहत तँ रहत ओहिपर महिस पोसत।
माए सुनू, गाम आब ओ गाम नहि रहलै आ परदेश परदेशे होइ छै, ओहिठाम कतबो कियो रहि जेए अप्पन नहि होइ छै। जाहिखन केकरो अप्पन धरतीपर गुजर नहि होइ छै तखने परदेश जाइए।
बेस से तँ ठीक मुदा ई महिस ? गामपर रहबअ तँ  महिसे पोसबअ?”
माए एहिमे खरापीए की छै आ देखू दिल्ली मुम्बई जाएब किएक पाइ लेल, कतेक तँ पन्द्रह बीस हजारक नोकरी, खाइत पीबैत बचत कतेक चारि पाँच हजार मुदा की चारि पाँच हजारसँ जीवन चलि जेतै।
तँ की महिससँ जीवन चलि जेतै।
पढ़ूआ काकाकेँ एकटा महिससँ जीवन चललनि की नहि।
तँ की हुनके जकाँ भए जेबअ।
सुनू हमर प्लान, हम पाँचटा नीक नस्लक महिस आ संगे एकटा नोकर राखि कए एहि काजकेँ करब। दूधकेँ कतेक बेगरता आ महगाइ छै से तँ बुझिते छीऐ।  आब देखू एकटा नीक नस्लक महिस चालीस लिटर रोजकेँ एवरेज दूध देतै तँ पाँचटा कतेक भेलै ४० गुने ५ = २०० लीटर रोजकेँ। आब पाइ, चालीसो रुपैए लीटर बेचब तँ २००*४०= आठ हजार रुपैया रोजकेँ अर्थात महिनाकेँ दू लाख चालीस हजार, चालीस हजार खरचो भए गेल तँ दू लाख महिनाक आमदनी, गोवर काठी, परा पारी अलग।
गे माए ई केना भऽ जेतै, दूऽऽऽऽऽऽ लाख रुपैया महिना।” 

बुधवार, 26 जून 2013

अन्न धन

बाबा अप्पन सात बर्खक पोतासँ, “की हौ बौआ, ललन कतए गेलाह ।”
“बाबूजी तँ पूजा कए रहल छथि ।”
“ईऽऽहऽ.. खेतोपर जेता की खाली पूजे केने गुजारा भए जेतनि, पूजो पाठ एक सीमे धरि नीक होइ छै । जीवन चलै लेल रुपैया चाही आ रुपैया लेल काज करए परै छै आ घरमे जखन अन्न-धन भरल रहै छै तकर बादे पूजो पाठ नीकसँ होइत छैक ।”
बाबा एसगर बड़बड़ाइत दलान दिस चलि गेला ।

सोमवार, 24 जून 2013

आँखिक पानि



“यौ गृहथ बचियाक दुरागमन छैक दू हजार रुपैया पैंच दिअ अगहनक कटनीपर आपस कऽ देब ।”
“हाँ खगता उत्तर मधुरगर मधुरगर बोल आ काज निकैल गेलापर गृहथ दुश्मन । परसु रमेशराकेँ कहलिऐ कनी दू दिनक बोइनिपर रहि जो, बारी झारी साफ करैक अछि तँ मुँह बना कऽ कहलक, मालिकक ओहिठाम काज कए रहल छी आ एखन मालिक कतए चलि गेला ।”
“बीतल बर्ख एहि बचियाक ब्याहपर मालिक दस हजार रुपैयाक मदद केने रहथिन, बिना आपसिक । आब अहीँ कहियौ, हुनकर बोइनि छोरि कऽ कतौ दोसरठाम काज कोना करतै, बोइनि तँ कतौ करहेक छै, तँ हुनकर ओहिठाम किएक नहि । एतबो आँखिमे पानि नहि रखबै तँ मुइला बाद उपर बलाकेँ की मुँह देखेबै ।”

बेगरता




“यौ काका, माए बड़ जोड़ दुखीत छै, अस्पतालमे भर्ती करबअ परतै, कने अहाँ दस हजार रुपैयाक व्यबस्था कए दिअ पाँच छह महिनामे हम दए देब।”
“तोरासँ तँ किछु नुकाएल छहे नहि जे हमर हालत आइ काल्हि केहन अछि मुदा हाँ भीड़परक जामुनक गाछ जँ बेच दहक तँ हम मैलाम बलासँ गप्प करी ।”
“बेचक तँ कोनो हर्ज नहि मुदा काका.... ओ जामुनक गाछ तँ कहूना पच्चीस हजारक हेतै ।”
“हाँ हाँ किएक नहि पच्चीस की तीसो भेट सकैत छैक मुदा ओहि लेल पाँच छह महिनाक चर्च आ इन्तजार दुनू चाही मुदा तोरा एखने बेगरता छ एतेक जल्दी तँ कियो दसो दऽ दिए तँ बड़ छैक ।” 
“एखन एहिना कतौसँ इन्तजाम कए दिअ, गाछ बेचहे परतै तँ बादमे नीक पाइ भेटलापर बेच लेब ।”
“से तँ बेस मुदा हमरा एखन कोनो दोसर उपाय कहाँ देखा रहल अछि ।”
“पाइ तँ आइए काल्हिमे चाही ।”
“हाँ ! भौजी लग किछु सोना होइन तँ....”
“सोना तँ सभटा पहिने बाबूक काजमे बिका गेलै । ठीक छै अहाँ साँझ धरि देखियौ, हमहूँ देखै छीऐ नहि किछु हेतै तँ जामुन गाछ तँ छैहे ।”
भोरे भोर माए केर अस्पतालमे भर्ती भए गेलनि । चारिटा जोन भीड़ परहुक जामुनक गाछ काटैमे लागल । ओमहर काका अप्पन बैंकमे पन्द्रह हजार रुपैया जमा करबैत ।

गजल

गजल

हम हाल की कहौँ आब बेहाल अछि
बड्ड कठिनसँ बीतल ई साल अछि

जानि नै मृत्यु हाएत केहन हमर
जीबैत जिनगी बनल जंजाल अछि

भ्रष्ट्राचारक गप्प जुनि करु भाइ यौ
नेता अफसर घूसलऽ नेहाल अछि

खूब मजा करु जा धरि अछि जिनगी
काल्हि लऽ जेबाले बैसल उ काल अछि

साँच बाजनिहार नै अछि कोनो ठाम
यौ फूसिक व्यापारमे बड्ड माल अछि

कलपै कानै भीतरे भीतर 'मुकुन्द'
प्रेममे सभक होएत ई हाल अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 14
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

गजल

गजल

जहियासँ अपन घर नाहि अछि
तहियासँ केकरो डर नाहि अछि

मोनक बात केकरा कहब आब
ऐहि ठाम कियौ हमर नाहि अछि

वियोगे हमतऽ कलपौँ असगर
अहाँ पर कोनो असर नाहि अछि

सास-पूतोहमे कलह मचल छै
बाँकी ऐहिसँ कोनो घर नाहि अछि

माँग बढ़ल दहेजक चहुँ दिस
आदर्श वियाहक वर नाहि अछि

सभ ठाम दंगा पसरल 'मुकुन्द'
शीश सहित कोनो धड़ नाहि अछि

सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 13
© बाल मुकुन्द पाठक ।।

रविवार, 23 जून 2013

भूख




ब्रेकिंग न्यूज । हिंदी सिनेमाक मशहूर अदाकारा ज ख फाँसी लगा कए आत्महत्या कए लेली।
टी भी देखैत हमर आठ बर्खक भतीजाक नेनपनसँ भरल प्रश्न, “बड़का बाबू ई आत्महत्या की होइ छैक ।”
“बेटा, अपन जीवनकेँ कोनो ने कोनो बिधिसँ खत्म केनाइ ।”
“मुदा बड़का बाबू, लोक अपन जीवनकेँ खतमे किएक करै छै ?”
“बेटा, जखन कोनो मनुखक भूख एतेक बढ़ी जाइ छैक की ओकरा शांत नहि कएल जा सकै तँ ओकर परिणति अंततः आत्महत्याक रूपमे होइ छैक ।”
मासूम अबोध नेनाक समक्ष हम ई फिलोसफी दए तँ देलहुँ मुदा एकरा ओ अबोध की बुझत । जखन मशहूर अदाकारा ज ख नहि बुझि पएलीह । हमहूँ बुझलहुँ कतए बस बेलूनक हबा जकाँ ई शव्द कतहुँसँ हमर मुँहसँ बहर भऽ गेल ।

शुक्रवार, 21 जून 2013

’सगर राति दीप जरय’क ७९ म आयोजन ‘कथा कोसी’ संयोजक - उमेश पासवानक, रिपोर्ट पूनम मण्डल

सगर राति दीप जरय’क ७९म आयोजन ‘कथा कोसी’ नामक वैनरक नीचाँ दि‍नांक १५ जून संध्‍या ६:३० बजेसँ शुरू भऽ १६ जूनक भि‍नसर ६ बजे धरि लौकही थाना अन्‍तर्गत औरहा गामक मध्‍य वि‍द्यालयक नव नि‍र्मित भवनमे श्री उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे गोष्‍ठी सुसम्‍पन्न भेल। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल।
      श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल एवं श्री रामचन्‍द्र पासवान जीक संयुक्‍त  अध्‍यक्षतामे तथा श्री वीरेन्‍द्र कुमार यादव आ श्री दुर्गागान्‍द मण्‍डलक संयुक्‍त  संचालनमे ऐ कथा गोष्‍ठीक भरि राति‍क यात्रा भेल। गोष्‍ठीक  शुभारम्‍भ श्री लक्ष्‍मी नारायण सिंह एवं श्री रामचन्‍द्र पासवानजी संयुक्‍त रूपे दीप प्रज्‍वलि‍त कए उद्घाटन केलनि‍।
      वि‍देह-सदेह-५ वि‍देह मैथि‍ली वि‍हनि कथा, वि‍देह सदेह-६ वि‍देह मैथि‍ली लघुकथा, वि‍देह-सदेह-७, वि‍देह मैथि‍ली पद्य, वि‍देह-सदेह-८, वि‍देह मैथि‍ली नाट्य उत्‍सव, वि‍देह-सदेह-९ वि‍देह मैथि‍ली शि‍शु उत्‍सव तथा वि‍देह-सदेह-१०, वि‍देह मैथि‍ली प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध-समालोचना नामक पोथीक लोकार्पण स्‍थानीय वि‍द्वतजन श्री संजय कुमार सिंह, श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री मि‍थि‍लेश सिंह, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री लक्ष्‍मी नारायण यादव तथा श्री वीरेन्‍द्र प्रसाद सिंह द्वारा भेल।
      लोकार्पण सत्रक पछाति दू-शब्‍दक एकटा महत्‍वपूर्ण सत्रक सेहो आयोजन भेल जइमे श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री बेचन ठाकुर, श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री कमलेश झा, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री राम वि‍लास साहु, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री रामानन्‍द झा ‘रमण’, श्री शंभु सौरभ, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ शि‍वकुमार प्रसाद, श्री अरूणाभ सौरभ तथा श्री उमेश मण्‍डल तथा संयोजक श्री उमेश पासवान द्वारा ‘सगर राति दीप जरय’ कथा गोष्‍ठीक दीर्घ यात्रा तथा उदेसपर सभागारमे उपस्‍थि‍त दूर-दूरसँ आएल कथाकार, समीक्षक-आलोचक एवं स्‍थानीय साहि‍त्‍य प्रेमीक मध्‍य मंचसँ अपन-अपन मनतव्‍य  रखलनि‍। जइमे सगर राति‍क ७५म आयोजनक पश्चात ७६ म आयोजन जे श्री देवशंकर नवीन दि‍ल्‍लीमे करेबाक घोषना तँ केने रहथि मुदा से नै करा साहि‍त्‍य  अकादेमी द्वारा आयोजि‍त कथा गोष्‍ठीकेँ गनि नेने रहथि जहू गि‍नतीकेँ सोझरौल गेल आ तँए ऐ गोष्‍ठीकेँ श्री उमेश पासवान अपन इमानक परि‍चए दैत ७९ म गोष्‍ठीक आयोजन केलनि‍। ओ कहलनि जे हम सभ अर्थात् वि‍देह मैथि‍ली साहि‍त्‍य  आन्‍दोलनसँ जूड़ल मैथि‍ली वि‍कास प्रेमी छी। हम सभ ७७म, ७८ म आयोजनक आयोजन कर्ताकेँ स्‍पष्‍ट रूपे कहैत एलि‍यनि‍ जे मुदा हमरा सबहक बात नहियेँ वि‍भारानी मानलनि आ नहि‍येँ कमलेश झा मानलनि‍। मुदा से हमहूँ नै मानब आ सही-सही गि‍नती करब। आ तही दुआरे ऐ गोष्‍ठीक आयोजन ७९मे आयोजन तँइ भेल, आयोजि‍त भेल। हलाँकि दरभंगासँ आएल कथाकार श्री हीरेन्‍द्र कुमार झाक उकसेला पर रहुआसँ आएल श्री वि‍नय मोहन झा जगदीश, श्री दुखमोचन झा आ दरभंगेसँ आएल श्री अशोक कुमार मेहता हीरेन्‍द्र  झाक संग गोष्‍ठीक आरम्‍भक घंटा भरि‍क पछाति चलि जाइ गेला।

      जीवि‍ते नर्क (उमेश मण्‍डल), शि‍क्षाक महत (राम वि‍लास साहु), बि‍आहक पहि‍ल गि‍रह (दुर्गानन्‍द मण्‍डल), बौका डाँड़ (लक्ष्‍मी दास), बंश (कपि‍लेश्वर राउत), टाटीक बाँस (राम देव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’), सगतोरनी (शि‍वकुमार मि‍श्र), पाथर, पि‍यक्कर, जोगार आ अंग्रेज नैना (अमीत मि‍श्र), संत आकि चंठ (बेचन ठाकुर), अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ), नमोनाइटिस (उमेश नारायण कर्ण), द्वादशा (सुभाष चन्‍द्र ‘सि‍नेही’), राँड़ि‍न (रोशन कुमार ‘मैथि‍ल’), पँचवेदी (अखि‍लेश कुमार मण्‍डल), मुइलो बि‍सेबनि (जगदीश प्रसाद मण्‍डल) इत्‍यादि महत्‍वपूर्ण लघु कथा/वि‍हन‍ कथाक पाठ भेल आ सत्रे-सत्र मौखि‍क टि‍प्‍पणी आ समीक्षा भेल।
अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ) क समीक्षाक क्रममे श्री रमानन्द झा "रमण" कथावस्तुसँ अपन असहमति देखेलनि आ कहलनि- " नै आब ई गप नै अछि, एकटा गप एतै देखियौ, हम  रमानन्द झा "रमण" श्रोत्रिय उच्च कुलक, आ कतऽ आएल छी! उमेश पासवानक दरबज्जापर!" श्री बेचन ठाकुर  श्री रमानन्द झा "रमण"क नव-ब्राह्मणवादी सोचक  विरोध करैत कहलनि- " लोकक मगजमे अखनो जाति-पाति भरल छै, मैलोरंगक प्रकाश झा तेँ ने कहै छथि जे बेचन ठाकुर भरि दिन तँ केश काटैत रहैए, ई रंगमंच की करत!! श्रीधरमकेँ सेहो ई गप बुझल छन्हि। माने मैथिली साहित्यकार, समीक्षक आ रंगमंचसँ जुड़ल ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्म्णवादी सोचक लोककेँ देखैत  ई कहल जा सकैए। २१म शताब्दीमे श्री रमानन्द झा "रमण"क बयान ई देखबैत अछि जे  कोना ओ उमेश पासवानक दरबज्जापर आबि उपकृत करबाक भावनासँ ग्रसित छथि।
अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डल प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल।