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जय मिथिला जय मैथिली

रचना मात्र मैथिलीमे आ स्वम् लिखित होबाक चाही। जँ कोनो अन्य रचनाकारक मैथिली रचना प्रकाशित करए चाहै छी तँ मूल रचनाकारक नाम आ अनुमति अवश्य होबाक चाही। बादमे कोनो तरहक बिबाद लेल ई ब्लॉग जिमेदार नहि होएत। बस अहाँकें jnjmanu@gmail.com पर एकटा मेल करैकेँ अछि। हम अहाँकेँ अहाँक ब्लॉग पर लेखककेँ रूपमे आमन्त्रित कए देब। अहाँ मेल स्वीकार कएला बाद अपन, कविता, गीत, गजल, कथा, विहनि कथा, आलेख, निबन्ध, समाचार, यात्रासंस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्ध रचना, चित्रकारी आदि अपन हाथे स्वं प्रकाशित करए लागब।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

गजल


प्रियतम अहाँ कए याद में जिनाई भेल मुस्किल
जीवैत त ' हम छीये नहि मरनाई भेल मुस्किल

किना सुनाऊ हाल करेजाक खंड कै हजार भेल
सब में अहाँक नां लिखल पढनाई भेल मुस्किल

लाख समझेलौंह मोन केँ  ई बनल अछि पागल
आबि अहीँ  समझा दिय ' समझेनाई भेल मुस्किल

केखनो-केखनो सोची पाहिले त ' हाल एना नै छल
जखन सँ भेटलौं अहाँ सँ रहनाई भेल मुस्किल

हमर मन  मंदिर में आब  मूरत अहीँक  अछि
बिना ओकर पूजा कए 'मनु' जिनाई भेल मुस्किल 

(सरल वार्णिक बहर,वर्ण-१९)
जगदानन्द झा 'मनु' : गजल संख्या -५ 

गजल@प्रभात राय भट्ट

                           गजल
नव वर्षक आगमन के स्वागत करैछै दुनिया 
नव नव दिव्यजोती सं जगमग करैछै दुनिया
 
विगतके दू:खद सुखद क्षण छुईटगेल पछा 
नव वर्षमें सुख समृद्धि  कामना करैछै दुनिया 
 
शुभ-प्रभातक लाली सं पुलकित अछी जन जन
नव वर्षक स्वागत में नाच गान करैछै दुनिया
 
नव वर्ष में नव काज करैएला आतुरछै सब
शुभ काम काजक शुभारम्भ में लागलछै दुनिया
 
नव वर्षक वेला में लागल हर्ष उल्लासक मेला
मुश्की मुश्की मधुर वाणी बोली रहलछै दुनिया
 
जन जन छै आतुर नव नव सुमार्गक खोजमे 
स्वर्णिम भाग्य निर्माणक अनुष्ठान करैछै दुनिया
 
धन धान्य ऐश्वर्य सुख प्राप्ति होएत नव वर्षमे
आशाक संग नव वर्षक स्वागत करैछै दुनिया
.............................वर्ण-१९.......................
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

@प्रभात राय भट्ट

                      गजल
नव वर्षक नव उर्जा आगमन भS गेल अछी
दू:खद सुखद समय पाछू छुईटगेल अछी 

इर्ष्या द्दोष लोभ लालच आल्श्य कय त्याग करी
रोग  शोक  ब्यग्र  ब्याधा  सभटा  पडागेल अछी

नव  प्रभातक  संग  नव कार्य शुभारम्भ करी
नव वर्षक नवका  सूर्य  उदय   भS गेल अछी  

अशुभ छोड़ी शुभ मार्ग चलबाक संकल्प करी
दिव्यज्योति सभक मोन में जागृत भगेल अछी

निरर्थक अप्पन उर्जाशक्ति के ह्रास नहीं करी
शुख समृद्धि प्राप्तिक मार्ग प्रसस्त भS गेल अछी 

सुमधुर वाणी सं सबहक मोन जीतल करी
सामाजिक सहिंष्णुता आवश्यकता भS गेल अछी
.............................वर्ण:-१८ ...........................
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट 

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011


गजल@प्रभात राय भट्ट

                              गजल
लुईटलेलक देसक माल, खाली पडल खजाना छै
देखू नेता सबहक कमाल,भ्रष्टाचारके जमाना छै 

विन टाका रुपैया देने भैया,हएतो नै  कोनो काज रे
बातक बातमे घुस मांगै छै,घूसखोरीके जमाना छै 

टुईटगेल इमानक ताला,करै छै सभ घोटाला रे
धर्म इमानक बात नै पूछ,बेईमानक जमाना छै 

दिन दहाड़े चौक चौराहा,होईत छै बम धमाका रे 
बेकसूर मारल जाइत छै,देखही केहन जमाना छै 

लूटपाट में लागल छै,देसक  सभटा राजनेता रे 
काला धन सं भरल पडल,स्वीश बैंक के खजाना छै 

अन्न विनु मरै छै देसक जनता,नेता छै वेगाना रे 
गरीबक खून पसीना सं भरल, एकर खजाना छै

नेता मंत्री हाकिम कर्मचारी,सभ छै भ्रष्टाचारी रे 
गरीबक शोषण सभ करैछै,अत्याचारीके जमाना छै 

भ्रष्टाचारीके दंभ देख "प्रभात" भS गेल छै तंग रे
भ्रष्टतंत्र में लिप्त छै सरकार,भ्रष्टाचारीके जमाना छै
...........................वर्ण:-२०.................................
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

• 'गजल'

तैयार छै लुटय लेल बेटीवाला त लुटेबे करतै
बिन दहेज ने उटतै दोली त रकम जुटेबे करतै

प्रेम रस में डुबल मोन आ जुरल हाथ
बिच में एतै दहेज त जुरल हाथ छोरेबे करतै

फोकटो में जे ने छै विवाहक लायाक दुल्हा
खरीदार भेटटै त ऒहो दुल्हा बिकेबे करतै

पनी सँ लबलबायाल भरल छै जे पोखैर
अकाल रौदी एतै त भरल पोखैर सुखेबे करतै

चोर के हाथ ज देबै समानक रखवालि
मैका भेततै त चोर समान चोरेबे करतै

जँ भरल गिलास छै पैन सँ
ऒहि मे भरबै पैन त पैन नीचां हरेबे करतै

जँ दहेज के लालच में हाथ धरी बैसतै बाप
बेटाक जरतै मोन त ऒ चक्कर चलेबे करतै

पर्दा के पाछु जे भ रहल छै दहेजक खेल
पर्दा नै उठतै त खेलबार खेल खेलेबे करतै

माय केर कौखि सँ हटायल जा रहल बेटीक भ्रुन
दहेक ने रुकतै त माय बेटीक भ्रुन हटेबे करतै

• 'गजल'

छोडी दियौ हाथ देखिऔ केम्हर जाइ छै
ईजोत में सदिखन मुदा अन्हारो में खाइ छै

अपना सँ छूरा के हाथ भागै छै
जोरै छै हाथ ऒम्हर जेम्हर देखैत पाइ छै

एतेक भरी खदहा कोरने अछि ई हाथ
कोसीस केलौ भरय के मुदा नै भराइ छै

तंग अछि लोक जै नेता सं
देख हाथ मे नोट ऒकरे पाछू पराइ छै

'बैचैन मोन'

बुइझ नै पेलौ
कोना बितल बचपन
कोना आइल लडकपन
कतेक मजा छल नादानी में
अंन्दाज नै छल
एतेक दुख भेटट जवानी में
आय जखन समय
गैची मांछ जेना
हाथ सँ फिसैल गेल
तहन बुझलौ जे
पावय आ हराव केर अही खेल में
जीनगी तय बेकारे गुजैर गेल

गजल'

उम्र दुल्हा केर घटल जा रहल अछि
दहेजक झोडी फटल जा रहल अछि

बानहल बांध भरोसा केर बाप पर
दहेजक बाडि मे बांध टुटल जा रहल अछि

चीन्ता सतावे दुल्हा के कहीं रही नै जै कुमार
जनगना में लडकी जे कमल जा रहल अछि

मजबुर बेटा कहलक बाप सं छोरु लालच दहेजक
जवानी व्यर्थ में बितल जा रहल अछि

पाकी गेल किछु केस मुदा बांकि छल मुँछ
आब त मुछो पकल जा रहल अछि

• 'गजल'

सजबै अहाँ एना त दिन में चान उगि जेतै
देखी अहाँ के हमर करेजा में उफान उठि जेतै

अहाँक झलक पावक लेल बैसै छि जे दलान पर
लोक कहीं बुझि गेलै त ऒ दलान छुटि जेतै

मोन हमर बहुत चंचल ताहि पर ई यौवन
एना जे नैना चलेवै त हमर ईमान झुकी जेतै

हमर जान जुरल जा रहल या अहाँक जान सँ
ज अहाँ आब रोकबै त इ नादान रुठि जेतै

• 'गजल'

अहाँक चौवनीया मुस्की केलक घायल
मोन हरौलक अहाँक छमछमायत पायल

केलक एहेन जादु अहाँक नैना के तीर यै
देखलौव बहुत मुद कियो दोसर नै भायल

कतय चुरौलौ अहाँ हमर मोन यै
कने कहु कतय अछि हमर मोन हरायल

आँखि सँ चुरा क नुकौलौ करेजा मे
फसल एना ककरो घिचनौ ने बहरायल

नवकी बहुरीया

शहर सँ एलि नवकी बहुरीया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

पहिरने जिंस ताहि पर टँप्स गजवे
घुमे सौसे चौक चौबटिया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

जेहने ढीठ तेहने निर्लज
टुकुर टुकुर देख हाँसे बुढिया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

के जान आर के अन्जान
लागे जेना सब हुनक संगतुरीया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

कतेक करब गुनगान हुनक
मुँह मे राखैत हैदखन पुरीया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

बुढ सास सँ काज कराबैथ
ठोकने रहैत दिनो के केवरिया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

• 'गजल'

जिनगी की कहु एहेन अंजान बाट मे चलल जा रहल अछि
भोर ठीक सों भेल नहि मुदा सांझ ढलल जा रहल अछि

मोजर त खूब लागल छल गाछ मे
टुकला ठीक सों भेल नही मुदा मोजर झरल जा रहल अछि

कियो अन्न बिन तरपै अछि त कियो पानी बिन
ककरो पानी भेटल नई मुदा ककरो गिलास मे मदिरा भरल जा रहल अछि

ककरो चूल्हा अन्न बिन बुझायल अछि
महगा बेचे के चक्कर मे ककरो कोठी मे अन्न सरल जा रहल अछि

बाहारक लगाल आगी देखी सब कियो बुझायात
के बुझायेत मोनक आगी जे बिन धधरे जरल जा रहल अछि

कियो मरि के जिब रहल अछि
कियो जी के जेना मरल जा रहल अछि

'कलेश"

करेजा मे घूसल एहेन कलेश
पल मे बदैल गेल सुन्दर रुप आ भेश
एहेन बज्र खसौलक विधाता
तौर देलक जिनगी केर डोर
ईजोतो मे सिर्फ अन्हार अछि
संतोष धरब ककरा पर
रोकने नै रुकै या आखिक नोर
हे सखी पहिने आबि
रांगल जिनगी केर रांगै छलौ
करम हमर फूटल
अपन सँ संग छूटल
अहुँ किया फेरै छी मुँह
कनेक खूशी देबय मे किया लागै या अबुह
जी के जेना रोज मरै छी
ककरा देखायब ई नोर
रोज आँचर मे धरै छी
ई नोर नै निकलैत अछी सिर्फ,
अपन दुखमयी जिनगी आ दशा पर
बल्कि किछू लोकक अवहेलना आ कुदशा पर
शूभ काज सँ राखल जाय या हमरा दुर
किछू लोकक मोन अछि कतेक क्रुर
हे सखी हमहु अही जेना नारी छी
मुदा भेद अछी सिर्फ एतवा
लोक कहैत अछी हमरा विधवा

'गजल'

जिनगी किया एना तंग लागै या
रांगल त छि मुदा बेरंग लागै या

बचपन बितेलौ रेत, मे जवानी खेत मे
कोना कततै बुढापा ऐकता जंग लागै या

जे दोस्त बनि दूस्मन भेल छल दूर
बेचारा भेल लाचार आब त ऒहो संग लागै या

मोजर नहि केलौ जकरा कहीयो
भैल शक्ति क्षिन्न आब ऒहो दबंग लागै या

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

गीत-3

(आलू  कोबी मिरचाई यै,
की  लेबै यै दाय यै / दाय यै )-२

कोयलखकेँ  आलू, राँचीकेँ  मिरचाई यै
बाबा करता बड्ड, बड़ाई यै / बड़ाई यै
आलू  कोबी - - - - - - -दाय यै

नहि लेब
 तँ  कनी देखियो लियौ 
देखएकेँ  नहि कोनो पाई यै / पाई यै
आलू  कोबी - - - - - - - - दाय यै

दरभंगासँ अन्लौंह विलेतिया ई कोबी
खा
 कs तs कनियाँ बिसरती जिलेबी 
कोयलखकेँ  आलू  ई चालू  बनेतै
धिया-पुताकेँ  बड्ड  ई सुहेतै
राँचीसँ अन्लौंह मिरचाई यै
की  लेबै यै दाय यै / दाय यै

( आलू  कोबी मिरचाई यै,
की  लेबै यै दाय यै / दाय यै )-२
***

रविवार, 25 दिसंबर 2011

गजल

ज्ञानी नहि हम किछु जानी नहि 
अल्प वुद्धि किछु  पहचानी नहि 

हम छी मैथिल मिथिला हमर 
मिथिला  छोरि क ' किछु मानी नहि 

इतिहास भूगोल सँ अनभिक
राजनीती किछु पहचानी नहि 

कविता-गजल कए ज्ञान नहि 
गद्य-पद्य विधा हम  जानी नहि

मोनक भाब राखि कागज पर 
लेखन कलाकेँ  हम ज्ञानी  नहि


(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२)
जगदानन्द झा 'मनु' : गजल  संख्या-४ 

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

गजल (३) जगदानन्द झा 'मनु'

पहड राईत बीत गेल निन्द नहि आबैए हमरा
रैह-रैह कs अहाँक सुन्नर याद सताबैए हमरा

सुन्नर-मोहनी छवि अहाँक,आँखि में जए बसोने छी
सिनेहिया सलोनी हमर,बड्ड तरसाबैए हमरा

घरी-घरी बजाबै छी,अहाँ अपन चंचल इशारा सँ
मुइन लिय कोना कs आँखि अपन,काचोतैए हमरा

जुनि खसाबू एतेक अहाँ,अपन दाँतक बिजुडिया
एतेक इजोरिया अहाँक ,आब तरपाबैए हमरा

मधुर मिलन होएत अपन,कखन कोन बिधि सँ
ओही के विचारे सँ,करेजा हमर जुराबैए हमरा

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२०)

रविवार, 18 दिसंबर 2011

गीत-2

लगबियौन-लगबियौन हिनकर बोली ई, दूल्हा आजुकेँ
हिनकर बड्ड  मोल छैन, ई  तँ दूल्हा आजुकेँ
हिनकर बाबू  बिकेलखिन लाखे, बाबा कए हजारी
लगबियौन मिल जुइल कs बोली ई दूल्हा आजुकेँ

हिनकर गुण छैन बरभारी, ई रखै छथि दूटा बखारी
दरबज्जा पर जोड़ा बडद,रंग जकर छैन कारी
भैर दिन ई पाउज  पान करैत छथि, जेना करे पारी
भोरे उठि  ई लोटा लs कs पीबए जाए छथि तारी

साँझु-पहर चौक पर जेता, चाहीयनि  हिनका सबारी
ई छथि माएक बड्ड -दुलरुआ,हिनका दियौंह एकटा गाड़ी
हिनकर गुण छैन बरभारी ई पिबई छथि खाली तारी
हिनका पहिरs आबै छैन नहि धोती, दियौन जोर भैर सारी

लगबियौन-लगबियौन हिनकर बोली ई,दूल्हा आजुकेँ
हिनकर बर मोल छैन, ई  तँ दूल्हा आजुकेँ

***

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

गजल @ जगदानन्द झा 'मनु'

भाइ आब हमहूँ   लिखब अपन फूटल कपारपर
जेना ई  भात-दालि तीमन ओकर उपर अचारपर

सोन सनक घर-आँगन  स्वर्ग सन हमर परिवार
छोड़ि एलहुँ देश अपन  दू-चारि टकाक बेपारपर

कनिको आटा नहि एगो जाँता नहि करछु कराही नहि
नून-मिरचाइ आनि लेलहुँ सभटा पैंच-उधारपर

चिन्हलक नै केओ नै जानलक तूअर बनि रहलहुँ
गेलहुँ ई अपन माटि-पानि छोड़ि दोसरक द्वारपर

हम कमेलौं घर ओ भरलक हमर खोपड़ी खालिए
आब बैसल मनुकनैए   बरखामे चुबैत चारपर

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२१)

@ जगदानन्द झा ‘मनु’

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

कविता- हम मौन किएक छी ?

हम मौन किएक छी?
हम चुप किएक छी?

निष्ठुर हमर समाज बनल अछि
निराकार सरकार
निर्लज सोनित आताताई
निर्भीक गुंडा राज

हम मौन किएक छी?
हम चुप किएक छी?

परवाशी बैन हम रहब कतेक दिन
दूर - परायब कतेक दिन
हमर समाज हमहि सुधारव
हमर सरकार हमहि बनायब
आताताई गुंडा के आब हमहि सतायब

हम मौन किएक छी?
हम चुप किएक छी?
*** जगदानंद झा 'मनु'
---------------------------

("विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका,१ नवम्बर २०११,में प्रकाशित)

गुमान

बहुत गुमान अछि हम मैथिल छी
मिथला हमर शान अछि
उदितमान ई अछि धरती पर
कोनो स्वर्ग समान अछि !
कण-कण खल-खल कोसी कमला
बुझु एकर पहचान अछि
जनक-जानकी आ विद्यापति
मिथलाक शिर कए पाग अछि !
भक्ती रस कए कथा की कहू
स्वयं संकर चाकरी कने छथि
एकर बिद्व्ता जुनी कियो पुछू
मुंडनमिश्र आ अजानी
भारतीक नाम बिख्यात अछि !
*** जगदानंद झा 'मनु'

("विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका,१ नवम्बर २०११,में प्रकाशित)

कविता -मिथला राज

हम धीर-वीर बलवान मैथिल
मिथला राज चाहैत छी,
ई हमर भीख नहि बुझु,
अधिकार अपन माँगे छी |

जाहि दिन धीर हम अधीर भेलौह
वीर हम वीरता दिखा देव,
नहि, फेर विश्वाश करू हमर
की एक चाणक्य हम आर बना देव |
***जगदानंद झा 'मनु'
------------------------------------------------

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

मिथिलाक गुणगान

सुनू  मिथिलाकेँ गुणगान अहाँ  हम की कहु अपन मोनेंसँ
सभ  किछु तँ  अहाँ जनिते छी मुदा,  हम कहैत छी ओरेसँ

उदितमान ई अछि अती  प्राचीन, ज्ञानक अती भंडार अछि
ऋषि-मुनिकेँ पावन धरती,  महिमा एकर अपार अछि

ड्यौढ़ी-ड्यौढ़ी फूलबारी  आँगनमे तुलसी सोभति
कोसी-कमला मध्य बसल ई,  भारतकेँ  सुंदर मोती

भक्ती-रससँ कण-कण डूबल  अछि महिमा एकर अपार
शिव जतए एला चाकर बनि कए, सुनि भक्तकेँ  करुण पुकार

काली विष्णु पूजल जाइ छथि,  मिथिलाक एके आँगनमे
छैक कतौ आन ई सामर्थ कहु,  होई जे आँखिक देखनेमे

एहि धरतीसँ जानकी जनमली, श्रृश्टीक करै लेल कल्याण
श्रीराम संग ब्याहल  गेली,  पतिवर्ताक देलैन उदाहरण महान

आजुक-काइल्हुक गप्प जुनि पुछू,  भ्रस्ट बनल अछि दुनियाँ
मुदा   मिथिलामे एखनो देखूँ,   शुरक्षित घरमे छथि कनियाँ

माए-बापकेँ  आदर दए छथि, एखनो धरि  मिथिले बासी
पूज्य मानि  पूजा करैत छथि,  घर आबए जे कियो सन्यासी

आजुक युगमे धर्म बचल अछि,  जे  किछु एखनों मिथिलेमे
आँखिक पानि  बचल अछि देखू,  जे किछु एखनों मिथिलेमे

की  कहु आब मिथिलाक महिमा, समेएल  जाए नहि  लेखनीमे
हमरामे ओ सामर्थ नहि अछि,    बाँधि सकी जे पाँतिमे

जगदानन्द झा ‘मनु’

ग्राम पोस्ट हरिपुर डीहटोल, मधुबनी   


शनिवार, 3 दिसंबर 2011

मैथिलिक विकासक बाधा



मैथिलीक  विकाशक  बाधा थिक
आजुक युवाशक्ति मिथिलाक
पढि लिख कए बनि  जाईछथि
डाक्टर आ कलक्टर
मुदा नहि पढि-लिख सकैत छथि
मिथिलाक दू अक्षर

घरसँ निकलैत
ओ कहथिन "चलो स्टेशन"
लागैत छनि संकोच
कहैमे की "चलु स्टेशन"
जेता जखन गामक चौक पर
लागत जेना
बैस रहला मैथिलीक  कोखिपर

शैद्खन दुगोत समभाषी
बाजत अपने भाषा
परन्च दूगोत मैथिल
जतबैलेल अपन प्रशनेल्टी
मैथिली  तियागि कए
बजए लगता सिसत्मेती
अपन माएक भाषासँ
प्रेस्टीज पर लागैत छनि  बट्टा
लोग की कहतनि 
संस्कारीसँ भए गेला मर्चत्ता
संस्कारीसँ भए गेला मर्चत्ता |
*****
 जगदानन्द झा 'मनु'